Friday, 3 July 2015

दो पक्छों के मध्य वाद विवाद में समचित्त रहना तटस्थस्ता कहलाती  है! काम जय वासनाछीन होने  से सधता है !स्वामी विवेकानंद का नाम विदिविशाननद था ! जिसका अर्थ होता है जो अभी मार्ग में है ! और मंजिल पर नहीं पहुंचा है !विवेकानंद नाम उनको खेत्री के राजा ने दिया था ! जो उनका परमभक्त था ! काम वासना को जीतने के लिए उसका प्रतिरोधी भाव विकसित करना पड़ता है !और उसको शत्रु के सद्र्स्य समझना पड़ता है !अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण से प्रश्न किया था ! कि  मनुष्य न चाहता हुआ भी जबरदस्ती पकडे हुए की तरह किस से प्रेरित होकर पाप कर्म करता है ३(३६) !भगवान श्री कृष्णा ने कहा था काम ही पाप का कारण है ! इसकी कभी तृप्ति नहीं होती है ! यही महापापी है ! इसको ही तू अपना दुश्मन समझ ३(३७) ! यह काम इन्द्रियों मन बुद्धि में रहता है ! और यह काम इन्ही के द्वारा विवेक बुद्धि को ढक कर मोहित कर विवेक बुद्धि अर्थात अच्छी बुरे के भेद को समझने की शक्ति का नाश कर देता है  ३(४०)  इसीलिए सन्यासियों, संतो को इन्द्रियों को बस में करके इस ज्ञान और विज्ञानं के नाश करने वाले महान पापी काम को ज्ञान पूर्वक की गयी  साधना और सावधानी से मारना पड़ता है !सभी श्रेष्ठ मार्ग पर चलने वालों को इस साधना से गुजरना पड़ता है !स्वामी विवेकानंद को भी इस कामजय की साधना से गुजरना पड़ा था ! 

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