Wednesday, 1 July 2015

स एवायं मया ते अद्द्य योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तोअसि में सखा चेति रहस्यम हि एतत उत्तमम् !४(३) भगवान श्रीकृष्ण यहाँ कर्मयोग की अनादि परम्परा बता रहे हैं ! जो विद्यायें कर्म का सम्पादन करती हैं ! उन्ही के फल दिखाई देते हैं ! विद्या तथा कर्म में भी कर्म का फल हीं प्रत्यक्छ देखने में आता है ! प्यास से पीड़ित मनुष्य जल पीकर हीं शांत होता है ! उसे जानकार नहीं ज्ञान का विधान भी कर्म को साथ लेकर ही है ! अतः ज्ञान में भी कर्म विद्यमान है ! जो कर्म से भिन्न कर्मों के त्याग को श्रेष्ठ मानता है उसका कथन व्यर्थ ही है ! सूर्य देव आलस्य त्याग कर कर्म द्वारा ही दिन रात का विभाग करते हुए प्रतिदिन उदित होते हैं ! इसीलिए जीवन के सभी छेत्रों में मनुष्यों के लिए कर्म करने की प्रधानता है ! यदि कोई व्यक्ति सन्यासी हो गया है तो उसे भी अपने जीवन में भोग वासनाएं और कामनाओं को नष्ट करने के लिए साधनाएं करनी पड़ती हैं ! और ये साधनाएं ही उसका जीवन का प्रधान कर्म बन जाती हैं ! यदि सन्यासी वासनाओं और कामनाओं का नाश नहीं करता है ! और सिर्फ सन्यासी का वेश धारण कर लेता है तो वह बस्तवीक सन्यासी नहीं है ! उसी प्रकार कर्म की आवश्यकता  आत्मज्ञानी को भी है ! कर्मके बिना कोई भी व्यक्ति एक छन  भी नहीं रह सकता है ! और ना हीं उस व्यक्ति का जीवन चल सकता है ! इसीलिए किसी भी स्थिति में कर्मका त्याग संभव नहीं  है  ! हाँ कर्म को मोक्ष के लिए भी  !और संसार में रहने के लिए भी !  और संसार को व्यबस्थित रूप से चलाने के लिए भी कर्म को तदनुसार आचरणमे सतत उतारने की आवश्यकता है ! और कर्म को सतत आचरण में उतारने की विधि गीता बताती है ! कि सभी कर्म अनासक्त भाव से राग द्वेष से मुक्त होकर सुख दुःख से ऊपर उठकर हानि लाभ की चिंता न कर सिर्फ कर्तव्य निर्वहन की दृष्टि से किये जाते हैं ! वही कर्म समाज को व्यबस्थित करते हैं ! और मनुष्य को श्रेष्ठ बनाते हैं ! और कर्म बंधन से मुक्त हो कर मोक्ष प्रद हो जाते हैं ! इसी अनादि कर्म परंपरा का उपदेश गीता में दिया गया है ! 

No comments:

Post a Comment