याक़ूब को फांसी न हो इसकी जोरदार पैरवी की गयी ! सुप्रीम कोर्ट में भी रात्रि में सुनवाई हुई !तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा याक़ूब की याचिका खरिज हो जाने के बाद भी ! राष्ट्रपति द्वारा उसकी याचिका खारिज करदिये जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट को रात्रि में याकूब के वकीलों की दलील सुननी पड़ी !यद्द्पि यह सब कानून के अंतर्गत हुआ !किन्तु कानून के अंतर्गत नागरिक अधिकारों का यह दर्शन अन्य मुकदद्मों में देखने को नहीं मिलता है !देश की जेलों में भूसे की तरह जिनपर मुकदद्मे चल रहे हैं बे अपराधों में आरोपित लोग जमानत न मिलने के कारण बंद हैं !जमानत के मामले पूरे मुकदद्मे की सुनवाई से भी अधिक खर्चीले हो गए हैं !सामान्य अपराधी तो जमानत का खर्च बर्दास्त ही नहीं कर सकता है !जमानत भी अधिकांश में उन्ही लोगों को प्राप्त होती है जो वकीलों की भारी फीस और न्यायलय पुलिस आदि का खर्चा उठाने में सक्छम होते हैं !जेल में प्रभावशाली लोग बंद होते हैं उनको सभी अच्छी से अच्छी सुविधाएँ प्रदान कराईजाती हैं !जब राजनेता बंद होते हैं तब तो जेल अधिकारीभी उनकी सेवा में लगे रहते हैं !और जो सामान्य कैदी होते हैं उनको तो सरकार द्वारा कानूनी तौर पर दिया गया भोजन और दबाएं भी नहीं दी जाती है ! उनका राशन पानी और दाबाएँ जेल के अधिकारी कर्मचारी और डॉक्टर खा जाते हैं !ये सारी बातें सरकार और न्यायाधीशों के संज्ञान में भी हैं !किन्तु इनका समाधान अभी तक नहीं हो पाया है !जेलों में जिला जज जिलाधीश आदि के निरीखछन भी होते हैं !कभी कभी छापे भी लगाए जाते हैं !उच्च न्यायल्लय के निर्देश भी होते हैं !किन्तु जेल व्यबस्था में फिर भी सुधार नहीं हो पाता है !याकूब को फांसी न हो इसके लिए देश के कुछ स्वनाम धन्य बुद्धिजीवियों ने अपील भी की थी ! जिसमे फिल्म अभिनेता राजनेता लेखक समाज सेवी ,प्रख्यात अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश भी शामिल थे !सबसे अधिक आश्चर्य की बात तो यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश भी प्रश्नचिन्ह लगा रहे थे !और प्रश्नचिन्ह लगाने वालों में विख्यात अधिवक्ता जेठमलानी आदि भी थे जिन्होंने सारे जीवन तस्करों हत्यारों और इसी प्रकार के सबसे खतरनाक अपराधियों की पैरवी कर कानून के चुंगल से कानून के माध्यम से ही छुड़ाया था ! इनका सारा कानूनी ज्ञान सिर्फ उन्ही खतरनाक अपराधियों की मदद करता है जो इनको मोटी फीस देता है !इन लोगों का ध्यान कभी सामान्य कैदियों की समस्यायों के निराकरण की और नहीं गया !जो उच्चतम न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश हैं कि बे यह दाबा करसकते हैं कि उनके दिए गए सभी निर्णय सही थे ? और उन निर्णयों में दोषी व्यक्ति छोड़े ना गए हों!? और निर्दोष व्यक्ति दण्डित ना हुए हों ? क्या इनको भी यह बताने की आवश्यकता है !की न्यायाधीशों को निर्णय पत्रावली पर उपलब्ध साक्छ्य के आधार पर देना होता है !और याकूब के फांसी के मामले में भी निर्णय गबाहान के व्यानो और उपलब्ध साक्छ्या के आधार पर ही दिया गया था !उसकी सभी प्रकार की याचिकाएं राज्यपाल से लेकर उच्चतम न्यायलय के जजों द्वारा तथा राष्ट्रपति के द्वारा भी अनेक बार ख़ारिज की जा चुकी थीं !फिर भी वकीलों की फौज रात्रि में भी सुप्रीम कोर्ट में दलीलें पेश करती रही ! और देश के तथाकथित गण्यमान व्यक्ति भी उसकी पैरवी अंतिम समय तक करते रहे !इसके पीछे धन शक्ति थी ?या धन शक्ति के साथ कोई अन्य शक्ति भी काम कर रही थी ?
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