Wednesday, 22 July 2015

किसी भी मनुष्य की क्रियात्मक, भावनात्मक और चिंतन की गतिविधियाँ एक ही रूप में हमेशा  नहीं रहती हैं !बे समयानुसार बदलती रहती है !विदुर धृतराष्ट्र के सबसे छोटे भाई और मंत्री भी थे !बे अपने समय के सबसे बड़े नीतिविशारद और आध्यात्मिक पुरुष थे !उनको महाभारत में धर्म के अंश से उत्पन्न बताया गया है !भगवान श्री कृष्णा जब कौरवों पांडवों के मध्य शांति स्थापना के लिए हस्तानुपुर गए थे ! तब बे धृतराष्ट्र  द्वारा सभी सुविधाओं और भोग विलास युक्त दुशाशन के महल में रहने  के बजाय विदुर के यहाँ ही ठहरे थे !तथा उन्होंने दुर्योधन के यहाँ भोजन करने से मना कर दिया था ! और विदुर के यहाँ ही भोजन किया था !धृतराष्ट्र स्वयं भी बहुत बड़ा ज्ञानी और धार्मिक व्यक्ति था !किन्तु अपने पुत्र दुर्योधन में आसक्ति के कारण वह सही निर्णय नहीं ले पाता था !और उसका पुत्र में आसक्ति के कारण कर्त्तव्य अकर्तव्य का बोध नष्ट हो गया था !तथा वह अधर्म को ही धर्म मानने लगा था !विदुर ने उसको उपदेश कर धर्म के वास्तविक तत्त्व अध्यात्म को समझाने के लिए जो उपदेश दिया है !उसी उपदेश के अंगरूप में कामी, क्रोधी, प्रमादी, थके, आलसी, जल्दबाज आदि लोगों से दूर रहने की बातें कही गयी हैं !इन्तु इस नीति गत उपदेश का मुख्य उद्देशय शाब्दिक ज्ञान को अनुभव जन्य ज्ञान में बदलने का है !इसलिए इसी उपदेश में विदुर कहते है !की राजन संसार में पांच  तरह के लोग जहाँ कहीं भी आप जाएंगे आपको अवश्य मिलेंगे --(१)आश्रय मांगने वाले (२)आश्रय देने वाले (३)प्रसंसा करने वाले (४)निंदा करने वाले (५)और उदासीन, तथा  तटस्थ !  इसलिए विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं कि मनुष्यों के बाह्य आचरण को ध्यान में रख कर व्योहार तो करो किन्तु अंदर से अनासक्त भाव से राज धर्म का पालन लोकहित में निष्पक्छ और न्याय दृष्टि से करो !!

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