यः तु इन्द्रियाणि मनसा नियम्य आरभते अर्जुन !कर्मेंद्रियः कर्मयोगम असक्तः स विशिष्यते !३(७) जो मनुस्य मन से इन्द्रियों पर नियंत्रण करके आसक्ति रहित होकर समस्त इन्द्रियों के द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है !वही श्रेष्ठ है !जो मनुष्य सार्वजानिक जीवन में महत्त्व पूर्ण पदों पर बैठे हुए है !और जो सामाजिक जीवन को संचालित करते हैं !उसकी व्यबस्था करते है ! गति प्रदान करते है ! और समाज पर जिनका प्रभाव भी होता है !यदि ऐसे लोग अपनी अवांछनीय शरीर पोषण और शरीर को पद प्रतिष्ठा धन संपत्ति प्रदान कराने की कुत्सित चेस्टाओं को निष्काम कर्मयोग और अनाशक्ति भाव से जोड़ कर सामाजिक पदों का कर्त्तव्य निर्वहन करें तो समाज को स्वर्गिक आनंद इसी पृथ्वी पर प्राप्त करने में विलम्ब नहीं लगेगा !अपने शरीर और परिवार की रक्षा सुरक्षा तो पशु पक्छी भी करते हैं !इसीलिए मनुष्य की विशेषता सिर्फ अपने शरीर और परिवार के पोषण में ही नहीं है !उसकी विशेषता तो सभी प्राणियों के लिए कल्याण कारी काम करने में हैं !मनुष्यों द्वारा किये गए कुछ काम काल और परिस्थिति के कारण अन्य सार्वजानिक सेवा के कार्यों से अधिक महत्त्व पूर्ण हो जाते हैं !आज के समय में मीडिया का महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया है !मीडिया जनता के विचारों का निर्माण भी करती है ! और देश समाज में होने वाली घटनाओ का प्रकाशन भी करती हैं !और कुछ घटनाओं को महत्त्व देती है ! और कुछ की उपेक्छा कर देती है !इस समय मीडिया लोकहित के दृष्टि कोण से हट कर अपने स्वार्थ पोषण में लगी हुई है ! मीडिया राजनेताओं फिल्म अभिनेताओं प्रभाव शाली भ्रष्ट लोगों क्रिकेट खिलाडियों हत्या लूट बलात्कार और नेताओं की स्तुति और निंदा आदि की चर्चा प्रमुखता से करता है !धर्म के छेत्र में राशिफल आदि को प्रमुखता से प्रकाशित किया जाता है !मीडिया का काम सिर्फ पाठकों की रूचि के अनुसार समाचार आदि का ही प्रकाशन करना नहीं है !बल्कि पाठकों की रूचि को प्रसाक्छित कर परिमार्जित करना भी है !पर तंत्र भारत के समाचार पत्र सदाचार पात्र थे ! जिस से देश में स्वतंत्रता की भावना जगी थी !आज भी मीडिया को अपना पुराना रूप, स्वरुप जाग्रत करना चाहिए ! ताकि समाज सदाचार की और उन्मुख हो !जैसे समाचार पत्र खोज कर अपराधिक घटनाओं का प्रकाशन करते हैं !उसी प्रकार से उसको समाज के हर छेत्र के ईमानदार निष्काम कर्मयोगिओं के समाचार भी प्रकाशित करना चाहिए ! मनुष्य की श्रेष्ठता इस में हैं ! कि वह मन से अपनी अवांछनीय अनैतिक भोग वासनाओ पर नियंत्रण करे ! फिर शुद्ध भाव से लोक हित में समर्पित होकर अपनी शक्ति और सामर्थ्य से कर्तव्य का निर्वहन करे ! और अपना जीवन भी आनंद मय बनाये और देश और समाज को भी अपने सामाजिक उत्तरदायित्त्व के अनुसार सुखी और संपन्न बनाये
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