मनुष्यों के संपूर्ण कर्म इन्द्रियों और भौतिक पदार्थों के संयोग से होते है !किन्तु जो मन बुद्धि चित्त और अहंकार मनुष्य के बाहर दिखने वाले कर्मो को नियंत्रित, प्रेरित और संचालित करते हैं ! वह अंतःकरण दृष्टिगोचर नहीं होता है !इसीलिए स्थूल कर्मों को सुखमय आनंद मय बनाने के लिए अंतःकरण को शुद्ध कर उस पर नियंत्रण करना पड़ता है !धैर्य बुद्धि का गुण है !बुद्धि का काम निश्चय करना होता है !और उस निश्चय को धारण धृति के द्वारा धारण किया जाता है ! अगर किसी ने निस्चय किया है ! की वह हर हालत में अपनी पत्नी को संतुष्ट रखेगा ! मान अपमान को चित्त की शांति को भंग नहीं करने देगा !हानि लाभ में चित्त की समता कायम रखेगा !इसी प्रकार के अन्य भौतिक कार्य जो चित्त और मन बुद्धि को अशांत करते हैं !इन सभी बाह्य अशांति और दुःख तथा मन चित्त और बुद्धि की समचित्तता को यथाबत कायम रखने के लिए जिस धैर्य की आवश्यकता है !उस धैर्य को कायम रखने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने गीता २(१४)में कहा है1 कि सर्दी, गर्मी, सुख दुःख मान अपमान हानि लाभ संयोग वियोग आदि देने वाले इन्द्रियों और विषयों के संयोग तो उतपत्ति, विनाश शील और आने जाने वाले हैं ! ना सुख स्थायी है ! और ना दुःख सदा रहने वाला है ! इसलिए मनुष्य को इन सभी स्थितियों और परिश्थितियों में धैर्य धारण करना चाहिए !अगर इस तरह से बुद्धि को शिक्छित और संस्कारित किया जाएगा तो सभी परिश्थितियों में धैर्य बना रहेगा !धैर्य के अभाव में मनुष्य का जीवन बिना मल्लाह के नाव के समान है !
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