मोहनजोदड़ों के लोगों का भोजन और रहन सहन -------- लोगों के खान पान रहन सहन ,आचार अदि को ही संस्कृति कहते है !यह संस्कृति कृति से जब संस्कारित हो जाती है !तब संस्कृति कहलाती है !इस संस्कृति का मूल आधार धर्म होता है !और भारत में धर्म का मूल आधार वेदों को माना जाता है !भोजन को तीन भागों उत्तम ,मध्यम और अधम में वेदों के सार गीता में निरूपित किया गया है !आयु ,सत्त्वगुण ,शक्ति ,आरोग्य सुख ,आनंद की बृद्धि करने वाले रस युक्त , घी ,मक्खन दूध ह्रदय की शक्ति बढ़ने वाले और लंबे समय तक शरीर को पुष्ट करने के लिए स्थिर रहने वाले ऐसे भोज्य पदार्थ सात्त्विक मनो बृत्ति ,अहिंसक लोगों को प्रिय होते हैं! ऐसा भोजन श्रेष्ठ भोजन माना गया है !जो भोजन अति कडुए अति खट्टे ,अति नमकीन ,अति गरम अति तीखे (चटपटे )अति रूखे और ह्रदय में जलन पैदा करने वाले और दुःख शोक ,और रोगों को उत्पन्न करने वाले भोज्य पदार्थ सिर्फ स्वाद के लिए भोजन करने वाले और इस प्रकार की भोज्य सामग्री से बीमारी होती है , भोजन केपरिणाम विचार ना कर भोजन करने विषयानुरागी भोगी मध्यम श्रेणी के पुरुष होते हैं !इसीलिए यह भोजन मध्यम गुण वाला कहा गया है ! जो भोजन सड़ा हुआ है ,रसरहित है ,जूठा है ,दुर्गन्धित बासी तथा मास ,मछली ,अंडे आदि है !ऐसा भोजन अधम अर्थात अत्यंत निम्न कोटि का माना गया है !और यह भोजन हिंसक स्वभाव के लोगों को प्रिय होता है !समाज किसी भी काल में एक जैसे विचार ,व्योहार के लोगों का नहीं होता है !उसमें भिन्न भिन्न रुचियों के स्त्री पुरुष हमेशा होते हैं !मोहन जोदड़ो में भी उत्तम ,मध्यम ,और अधम भोजन के पदार्थ खाने वाले लोग थे !
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