यथार्थ ज्ञान -------- (१)जैसे पृथवी में बोये हुए बीज का फल तुरंत नहीं मिलता है !उसी प्रकार किये हुए पाप का भी फल तुरंत नहीं मिलता है ! , परंतु जब वह फल प्राप्त होता है ,तब मूल और शाखा दोनों को जलाकर भष्म कर देता है !
२---पापी मनुष्य पाप कर्म के द्वारा धन पाकर हर्ष से खिल उठता है ! वह पापी अनीति और अधर्म से बढ़ता हुआ पाप कर्मों में आसक्त हो जाता है और यह समझ कर की धर्म है ही नहीं पवित्र आत्मा पुरुषों की हंसी उडाता है !,धर्म में उसकी तनिक भी श्रद्धा नही रह जाती है !और पाप के ही द्वारा वह सर्वनाश के मुख में जा गिरता है ! वह अपने को अजर अमर मानता है !परंतु उसे भी म्रत्यु पाश में जा पड़ना होता है !
३------ जैसे चमड़े की थैली हवा भरने से फूल जाती है ! बैसे ही अधर्मी पापी पाप कर्मों से फूल उठता है ! वह पूण्य कार्यों में कभी भी प्रवृत्त नहीं होता है ! तदनंतर जैसे नदी के तट पर खड़े हुए ब्रक्छ वहां से जड़ सहित उखड कर नदी मेंबह जाते हैं उसी प्रकार ये अधर्म परायण पापी भी जड़ सहित नष्ट हो जाते हैं
२---पापी मनुष्य पाप कर्म के द्वारा धन पाकर हर्ष से खिल उठता है ! वह पापी अनीति और अधर्म से बढ़ता हुआ पाप कर्मों में आसक्त हो जाता है और यह समझ कर की धर्म है ही नहीं पवित्र आत्मा पुरुषों की हंसी उडाता है !,धर्म में उसकी तनिक भी श्रद्धा नही रह जाती है !और पाप के ही द्वारा वह सर्वनाश के मुख में जा गिरता है ! वह अपने को अजर अमर मानता है !परंतु उसे भी म्रत्यु पाश में जा पड़ना होता है !
३------ जैसे चमड़े की थैली हवा भरने से फूल जाती है ! बैसे ही अधर्मी पापी पाप कर्मों से फूल उठता है ! वह पूण्य कार्यों में कभी भी प्रवृत्त नहीं होता है ! तदनंतर जैसे नदी के तट पर खड़े हुए ब्रक्छ वहां से जड़ सहित उखड कर नदी मेंबह जाते हैं उसी प्रकार ये अधर्म परायण पापी भी जड़ सहित नष्ट हो जाते हैं
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