Monday, 1 August 2016

गाँधी जी ने असयहोग आंदोलन का प्रारम्भ १ अगस्त १९२० में कैसरे हिन्द स्वर्णपदक लौटा कर कियाथा ---------  गांधीजी न १ अगस्त १९२० को वायसरॉय को पत्र लिखकर असह्ययोग आंदोलन का सूत्रपात किया था !
      प्रिय महोदय
                         साउथ अफ्रीका में मेरी मानवीय सेवाओं के लिए आपके पूर्वबर्ती वाइसराय द्वारा दिया  गया कैसरे हिन्द स्वर्ण पदक लौटाते हुए मुझे दुःख होता है !तथापि में इसे लौटा रहा हूँ !साथ ही जुलू युद्ध पदक जो १९०६ में भारतीय स्वयं सेवक सहायता दलकी अधिकारी की हैसियत से दक्छिन अफ्रीका में मेरी युद्ध सेवाओं के लिए प्रदान किया गया था और बोअर युद्ध पदक जो भारतीय डोली बाहक दल के सहायक निरीक्छक की हैसियत से १८९९ में बोअर युद्ध के दौरान मेरी सेवाओं के लिए दिया गया था बो  भी में लौटा रहा हूँ !खिलाफत आंदोलन के सिलसिले में आज से प्रारम्भ असहयोग की योजना पर अमल करने के संद्धर्भ में इन पदकों को बापिस कर रहा हूँ ! इन पदकों को मेने अपने सम्मान की तरह आँका है !परंतु फिर भी जबतक मेरे मुसलमान देश भाई अपनी धार्मिक भावनाओं के प्रिति किये गए अन्याय को झेल रहे हैं में इन पदकों को शांति पूर्वक  धारण नहीं कर सकता !पिछले महीने जो घटनाएं हुई हैं उनसे मेरी यह राय और भी दृढ हो गयी है कि साम्राज्य सरकार ने खिलाफत के मामले में अधर्म ,अनैतिकता और अन्याय से काम किया ! और फिर वह अपनी अनैतिकता की रक्छा के लिए एक के बाद  एकगलत काम करती ही चली गयी !में ऐसी सरकार के प्रति सम्मान और स्नेह नहीं बनाये रख सकता !साम्राज्य सरकार और आपकी सरकार का पंजाब के प्रश्न पर जो रुख रहा है उस से मुझे और भी गहरा असंतोष हुआ है !आप जानते ही हैं कि मुझे कांग्रेस द्वारा नियुक्त एक आयुक्त के रूप में अप्रेल १९१९ के दौरान पंजाब में हुए उपद्दरों    के कारणों की जाँच करने का सौभाग्य मिला था !उसके आधार पर मेरा सोचा समझा मन्तव्य यह बना है कि डायर पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर पद के लिए सर्वथा अयोग्य व्यक्तिहैं !और उनकी नीति ही अमृतसर भीड़ को उत्तेजित करने का मुख्य  कारण था !निसंदेह भीड़ द्वारा की गयी ज्यादतियां भी अक्छमय थी !!आगजनी, पांच बेगुनाह अंग्रेजों की हत्या और कुमारी शेरवुड पर कायरता पूर्ण हमला ,सभी बातें बहुत ही निंदनीय  और निष्कारण थी ! ,परंतु जनरल डायर,कर्नल फ्रेंक ,जॉनसन कर्नल ओ ब्रायन .श्री बासवर्थ, स्मिथ ,राय श्री राम सूद ,श्री मालिक खान ,और अन्य अफसरों ने सम्बंधित लोगों को दंड देने के इरादे से जो काम किये थे बे जरुरत से ज्यादा सख्त थे बे इस हद तक अमानवीयता और घोर निर्दयता से भरे हुए थे कि उनकी कोई मिशाल नहीं मिलती है !
         आपने सरकारी अधिकारियों के अपराधों को कोई महत्त्व नहीं दिया ! ,सर माइकेल डायर को सर्वथा दोष मुक्त कर दिया ! ,श्री मांटेग्यू ने जैसा सरकारी आदेश भेजा और सबसे अधिक लज्जा जनक कार्य  तो लार्ड सभा ने किया की उसने भी पंजाब की घटनाओं के बारे में  लज्जा जनक अज्ञान का प्रदर्शन किया और भारतीयों की  भावनाओं की जैसी निर्दयता पूर्ण अवहेलना की उसे देख कर मैं साम्राज्य के भविष्य के बारे में बहुत चिंतित हूँ ! में अब वर्तमान सरकार की ओर से बिलकुल ही विरक्त हो गया हूँ !और अब उसे पहले जैसा निष्ठापूर्ण सहयोग नहीं देसकता !भारत सरकार अपनी प्रजा के हितों की ओर से बिलकुल उदासीन साबित हुई है !मेरी नम्र राय में ऐसी किसी भी सरकार को पश्चाताप करने के लिए आवेदनों ,शिष्टमंडलों और ऐसे ही साधारण तरीके अपनाकर बाध्य नहीं किया जा सकता !
                 यूरोपीय देशों में पंजाब और खिलाफत के प्रति किये गए अपराधों जैसे गंभीर अपराधों को छमा करने का परिणाम जनता द्वारा हिंसा पूर्ण क्रांति होता !वहां की जनता राष्ट्र को अपांग बनाने की मन्शा से किये गए इस प्रकार के अन्यायों का हर कीमत पर मुकाबला करती !परंतु आधा भारत तो इतना अशक्त है कि उसमें हिंसात्मक विरोध करने की शक्ति नहीं है और शेष आधा ऐसा करना नहीं चाहता !अतएव मेने असहयोग का उपाय सुझाया है !इसके अनुसार जो लोग अपने को सरकार से अलग रखने के इक्छुक हैं बे सहयोग से हाथ खींच सकते हैं ! और यदि इस असहयोग को हिंसा से दूर रखकर व्यबस्थित ढंग से चलाया जाय तो सरकार को अपने पैर पीछे हटाने और गलतियां सुधारने को अवश्य ही वाद्य होना पड़ेगा !परंतु मैं जनता को जहाँ तक अपने  साथ लेकर चल सकता हूँ वहां तक असहयोग की नीति का पालन करते हुए भी आपसे यही आशा रखूँगा कि आप फिर न्याय के पथ पर चलने लगेंगे ! अतएव मैं आप से सादर निवेदन करता हूँ कि आप जनता के जाने माने नेताओं का एक सम्मलेन बुलाएं और उनके परामर्श से एक ऐसा रास्ता निकालें जो मुसलमानो को संतोष और दुखी पंजाबियों को राहत दे सके !
                                                                               आपका विश्वस्त
                                                                              मो क गाँधी 

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