Monday, 1 August 2016

१अगस्त १९२० को गांधीजी ने असहयोग आंदोलन प्रारम्भ किया था !और उसी दिन दुर्भाग्य से लोकमान तिलक का देहावसान हो गया !गांधीजी ने तिलक की देश भक्ति और देश सेवा का बखान करते हुए कहा था !लोकमान्य बालगंगाधर तिलक नहीं रहे उनकी म्रत्यु हो गयी यह विश्वास करना कठिन है !बे जनता के अभिन्न  अंग थे ! जनता पर जितना प्रभाव उनका था ! उतना हमारे युग के और किसी व्यक्ति का नहीं था !उनके हजारों देश भाई उन्हें जिस श्रद्धा की दृष्टि से देखते थे वह असाधारण थी ! निशन्देह बे जनता के आराध्य थे !हजारों लोगों के लिए उनके शव्द ही कानून थे !वास्तव में हमारे बीच से एक महामानव उठ गया है !सिंह की आवाज मौन हो गयी है !
               अपने देश भाईयों पर उनके इस जबरदस्त प्रभाव का कारण क्या था ?गाँधी जी की राय में इसका उत्तर बहुत सीधा सादा  था !उनकी देश भक्ति की भावना अत्यंत प्रवल थी ! स्वदेश प्रेम के अलावा बे और कोई धर्म नहीं जानते  थे !बे एक जन्मजात लोकतंत्र बादी थे !बहुमत के शासन में उनका विश्वास इतना उग्र था कि गांधीजी को डर लगनेलगता था !यह डर शारीरिक नहीं था !तिलक की स्वतंत्रता के प्रति कठोर और तीब्र राष्ट्र भक्ति और उनके अभूतपूर्व समुद्रवत अगाध ज्ञान के प्रति आदर के कारण था !तिलक की इक्छाशक्ति में  फौलाद की दृढ़ता थी !और उसका उपयोग उन्होंने देश के लिए किया !उनका जीवन पुस्तक के सामान था !----- जिसे जो चाहे पढ़ सकता था !उनकी रुचियाँ बहुत सादा थी !उनका व्यक्तिगत जीवन सर्वथा निष्कलंक और उज्जवल था !उन्होंने अपनी अद्भुत शक्तियां देश की सेवा को अर्पित कर दी थीं !जैसी लगन और धुन के साथ स्वराज्य के सिद्धान्त का प्रचार लोकमान्य ने किया था वह अनन्यतम था !इसीलिए देशबासी आंखमूंद कर उनका विश्वास करते थे !उनकी आशावादिता अदम्य थी !और बे बहुत साहसी  थे !उन्होंने अपने जीवन में ही स्वराज्य को पूर्ण रूप से प्राप्त होने की आशा की थी !अगर बे अपने जीवन में स्वराज्य प्राप्त करने में असफल रहे !तो इसमें उनका कोई दोष नहीं था !निश्चय ही उन्होंने स्वराज्य को बहुत निकट ला दिया था !गांधीजी ने कहा अब यह हमारा काम है कि हम कमसे कम समय में उनके उस स्वप्न को सत्य में परिवर्तित कर देने  के लिए दूने जोर से प्रयत्न करें !
                       तिलक नॉकरशाही के प्रबल शत्रु थे !लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि उन्हें अंग्रेजों और अंग्रेजी शासन से घृणा थी !गांधीजी नेकहा कि मेँ अंग्रेजों को आगाह कर देना चाहता हूँ कि बे तिलक ओ अपना शत्रु मानने की भूल न करें !
            गांधीजी ने कहा मुझे पिछली कलकत्ता कांग्रेस के अवसर पर उनसे हिंदी के राष्ट्र भाषा होने के सम्बन्ध में एक बहुत ही विद्वतापूर्ण वार्ता सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था !और यह वार्ता उन्होंने पहले से कोई तयारी किये बिना प्रस्तुत की थी ! बे उसी समय कांग्रेस पंडाल से लौटे ही थे !हिंदी पर उनकी गंभीर वार्ता सुनना सचमुच एक बहुत ही आनंददायक अनुभव  था !अपनी वार्ता में उन्होंने देशी भाषाओँ के विकास की और ध्यान देने के लिए अंग्रेजों की बड़ी सराहना की थी !यद्दपि अंग्रेज जूरियों केसंबंध में उनका अनुभव बहुत बुरा था !फिर भी उनकी इंग्लैंड यात्रा ने उन्हें ब्रिटिश लोकतंत्र का पक्का हामी बना दिया था !और उन्होंने बहुत ही गंभीरता के साथ यह विचित्र सा सुझाव तक दे दिया कि भारत को चाहिए की वह देश को सिनेमा के सहारे पंजाब के अन्याय से परिचित कराये !गांधीजी ने कहा इस घटना का वर्णन मेँ इसीलिए नही कर रहा हूँ कि इस सम्बन्ध में मै उनसे सहमत हूँ ! बल्कि मेरा उद्देश्य यह दिखाना है की अंग्रेजों के प्रति उनमें घृणा का कोई भाव नहीं था ! लेकिन उनके लिए यह सहन करना असंभव था कि साम्राज्य के भीतर भारत का दर्जा  अन्य देशों से कम हो !बे तत्काल समानता चाहते थे !उनका विश्वास था कि यह समानता उनके देश का जन्मसिद्ध अधिकार है !और भारत कीस्वतंत्रता केलिए लड़ते हुए उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत को बख्शा नहीं !इस लड़ाई में उन्होंने ना तो कोई किसी के साथ रियायत की और ना किसी से रियययत की मांग की !गांधीजी नेकहा मुझेयह विश्वास है की भारत के इस पूज्य पुरुष की योग्यता को अंग्रेज लोग भी स्वीकार  करेंगे !
     जहाँ  तक हम भारत बासियों की बात है !भावी पीढ़ियां  उन्हें आधुनिक  भारत केनिर्माता केरूप में याद करेंगी ! बेउन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में स्मरण करेंगी जो उनके लिए जिया और उनके लिए मरा !ऐसे व्यक्तिको मृत कहना ईश निंदा के समान है !उनके जीवन का जोस्थायी तत्त्व था ! वह तो हमेशा हमारे साथ रहेगा !आईये अब हम भारत के इस एक मात्र लोकमान्य की बहादुरी ,सादगी तथा अद्भुत कर्मठता औरदेश प्रेम के गुणों को अपने जीवन में उतारें और इस प्रकार उनका एक अमर स्मारक खड़ा करें ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे !

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