जितनी छति सनातन धर्म की गुलाम भारत में नहीं हुई !उस से ज्यादा छति आज हो रही है !देश में गुलाम भारत में हिंदुओं का धर्म परिवर्तन हुआ इसके बाद भी हिन्दू जीवन के मूल तत्त्व कृषि ,स्वाबलंबन अदि और हिंदुओं के सत्य सद्भाव आधारित स्वभाव का नाश नहीं हो पाया ! किन्तु आज जिस तरह से सनातन धैम के आतंरिक स्वरुप को नष्ट किया जा रहा है !यह सनातन धर्म की मूल संस्कृति और आत्मा का ही नाश कर देगा !लोकतंत्र की शासन व्यबस्था का आधार शासन सत्ता में बने रहना नहीं है !बल्कि जनता को अधिक जागरूक ,जिम्मेदार और सशक्त तथा स्वाबलंबी बनाने का है !सत्ता पुरुष्कार और सम्मान के लिए नहीं .बल्कि जन कल्याण के लिए होती है !लोकतंत्र का यह ध्येय तो सत्ता लोलुप अंधे नेताओं ने लुप्त ही कर दिया है ! सत्ता प्राप्ति के और उसमें बने रहने के जितने भी जाति वादी ,अगड़े पिछड़े ,दलित ,आदिवासी ,महिला शसक्तीकरण ,समाजवाद ,समरसता अदि के जितने भी साधन हो सकते हैं !उनसबका उपयोग राजनेता उपयोग करके अपनी आर्थिक और सामाजिक सत्ता और समृद्धि की बृद्धि के लिए निर्लज्जता पूर्वक कर रहे हैं !प्राचीन सामंतवाद ,पूंजी बाद ,भेद भाव अदि के स्थान पर आज राजनैतिक सत्ता में प्रवेश करने वाले चाय बेचने वाले दलित ,पिछड़े ,आदिवासी ,अगड़े और बहुत से पूर्व राजे महाराजे ये सब मिलकर एक नया सामंत बाद बंश परंपरा बाद और पूंजी बाद निर्मित कर रहे हैं !जिस के आगे प्राचीन राजाओं ,महाराजाओं की समृद्धि ,भोग .विलास और ऐश्वर्य भी फीका पड़ गया हैं !देश में चारों तरफ कागजी करेंसी के संग्रह में सभी लोग संलग्न दिखाई देते हैं !इस सामजिक कोढ़ में अब एक नया मुद्दा गाय की रक्छा का भी जुड़ गया है !गाय की रक्छा का प्रयत्न तो गांधीजी ने भी किया था !किन्तु जिस तरह से गाय की रक्छा को राजनैतिक लाभ का मुद्दा बनाकर ये तथा कथित गो भक्त देश में असुरक्च्छा का माहौल उत्पन्न कर रहे हैं !उस से गाय के प्राणों की रक्छा कभी नहीं हो पायेगी !गाय के क़त्ल और माश खाने वालों से कहीं बहुत अधिक जिम्मेदार बे सरकारें हैं !जिन्होंने गोचर की भूमि को पटटों पर दे दिया है !और शहरों का विकास और नए नए शहरों का निर्माण करके एक लाख गांव का नाम निशान ही मिटा दिया है !और कृषि की भूमि पर भवनों और अट्टालिकाओं का निर्माण कर के किसानों को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया है ! ये तथाकथित गो भक्त दलितों की मार पीट करते हैं !किन्तु कभी ये आँखों के अंधे यह नहीं देखते हैं !क़ि आबारा गायों के झुण्ड के झुण्ड इस गांव से उस गांव में कृषि फसल को नुक्सान पहुंचा रहे है !और शहरों में आवागमन में दिक्कत पैदा कर दुर्घटनाओं का कारण बन रहे हैं !देश में इन्ही धर्मध्वजी ,धर्मनाशक सत्ता धारियों के संरक्छण में हिन्दू व्योपारी गाय के मास का नित्यात कर रहे हैं ! अगर गो भक्तों को गाय के प्राणों की रक्छा करना ही है ! तो उनको गाय के प्राणों भक्छक इन असली कसाईयों के विरुद्ध आंदोलन करना चाहिए ! सर की बीमारी का इलाज हाथ काटने से नहीं हो सकता है !पहले से ही गरीबी और भूख से त्रस्त अन्याय पीड़ित भारत को धर्म के नाम से अधर्म के मार्ग पर मत चलाइये !
No comments:
Post a Comment