Monday, 24 October 2016

नीति रक्छा का उपाय -------- गांधीजी ----- हिंदी नवजीवन २५-५-१९२४
 मेरे विचार से मेरे विकार छींड हो रहे हैं !किन्तु उनका नाश नहीं हो पाया है !यदि मैं विचारों पर भी पूरी विजय पा सका होता तो पिछले १० सालों में जो तीन रोग पसली के वरम,पेचिश और एपेन्डिक्सके रोग मुझे हुए बे कभी नहीं होते !में मानता हूँ की निरोगी आत्मा का शरीर भी निरोगी होता है !लेकिन यहाँ निरोगी शरीर के मानी बलवान शरीर नहीं है !बलवान आत्मा छींड शरीर में ही वास करती है !ज्यों ज्यों आत्मबल बढ़ता है,त्यों ,त्यों शरीर की छींडता बढ़ती है ! पूर्ण नीरोगी शरीर बिलकुल छींड भी हो सकता है ! ब्रह्मचर्य का लौकिक अथवा प्रचिलित अर्थ तो इतना ही माना जाता है ----- मन ,वचन ,और काया द्वारा विषयेंद्रिय का संयम !यह अर्थ वास्तविक है ! क्योंकि इसका पालन करना बहुत कठिन माना गया है !स्वादेन्द्रिय के  संयम पर उतना जोर नहीं दिया गया है !इससे विषयेंद्रिय का संयम ज्यादा मुश्किल बनगया है ,लगभग असंभव हो गया है ! मेरा अनुभव तो ऐसा है ,कि जिसने स्वाद को नहीं जीतावह विषय बासना को नहीं जीत सकता ! स्वाद को जीतना बहुत कठिन है ! स्वाद को जीतने का एक उपाय तो यह है कि मसालों का सर्वथा अथवा जितना हो सके उतना त्याग किया जाय !और दूसरा अधिक शक्तिशाली उपाय हमेशा यह भावना बढ़ाना है ,कि भोजन हम स्वाद के लिए नहीं बल्कि स्वांश के लिए लेते हैं !पानी जैसे हम प्यास बुझाने के लिए पीते हैं ,उसी प्रकार खाना महज भूख बुझाने के लिए खाना चाहिये ! परंतु विषय वासनाओं को जीतने का स्वर्ण नियम राम नाम अथवा दूसरा कोई ऐसा मन्त्र है !द्वादश मन्त्र भी यही काम देता है !अथवा अपनी भावना के अनुसार किसी भी मन्त्र का जप किया जा सकता है !मुझे लड़कपन से राम नाम सिखाया गया है !मुझे उसका सहारा बराबर मिलता रहता है !इस से मेने उसे सुझाया है! जो मन्त्र हम जपें उसमें हमें तल्लीन हो जाना  चाहिये!मन्त्र जपते समय दूसरे  विचार आयें तो परवाह नहीं !यदि श्रद्धा रख कर जप करते रहेंगे तो अंत में सफलता अवश्य प्राप्त होगी इसमें संदेह नहीं है !वह मन्त्र हमारी जीवन डोर होगा और हमें तमाम संकटों से बचावेगा !येसे पवित्र मन्त्र को किसी को भी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज नहीं करना चाहिये !इस मन्त्र का चमत्कार है --- हमारी नीति को सुरक्छित रखने में !तोते कि तरह इस मन्त्र को ना पढ़ें !इस मन्त्र में अपनी आत्मा को पूरी तरह लगा देना चाहिये !अवांछनीय विचारों को मन से निकालने कि भावना रख कर मन्त्र को ऐसा करने कि शक्ति में विश्वास और श्रद्धा रख कर ! यह गांधीजी की आत्मविजय की जीवन यात्रा चुनाव में विजय प्राप्त करने के प्रयत्न में लगे हुए ,धर्म विनाशक लोगों के लिए काम की नहीं है ! 

No comments:

Post a Comment