१(४२) वर्णशंकर कुलघातिओं को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है लुप्त हुई पिण्डोदक क्रिया से पितरों का पितृलोक से पतन हो जाता है और बे अधोगति को प्राप्त होते हैं श्राद्ध लोप होने का अर्थ है पितरों के द्वारा आचरित सदाचरणो की विष्मृति श्राद्ध का आजकल एक नया रूपहो गया है समाज शुधारक श्राद्ध में ब्रह्मभोज को अनुचित मानते है वह कहते हैं यह कुरीति है इसका त्याग करना चाहिए तीन प्रकार के शरीर होते हैं स्थूल सुक्छम और कारण स्थूल शरीर का दाह होता है और सुखछम तथा कारण शरीर के लिए श्राद्ध किया जाता है जिसमे ब्राह्मणो को भोजन दान आदि मृतक शरीरसे निकली आत्मा की शांति के लिए किया जाता है यह क्रिया अनादि कल से चली आरही है श्री राम ने अपने पिता का श्री कृष्ण ने भांजे अभिमन्यु का तथा yuddhister और धृराष्ट्रा ने अपने पुत्रों पौत्रों तथा बीरगति प्राप्त समस्त राजाओं का श्राद्ध किया था
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