Monday, 3 October 2016

क्या सच है और क्या झूठ है ? कौन सा राजनेता देश भक्त है या पद भक्त है ? किस व्यक्ति के मन  बुद्धि ,वचन में   भारत राष्ट्र के प्रति वास्तविक सेवा भावना है !या सिर्फ अपनी स्वार्थों की पूर्ति का ही ध्येय है ? इन सभी बातों का सही पता लगा पाना सम्भव नहीं है !यह समस्या  आज की ही नहीं है !ज्यों  ज्यों व्यक्तियों की चाहत सांसारिक पदार्थों के प्रति आसक्ति में बृद्धि होती है ! वैसे   ही इस प्रकार के झूठ ,छल ,कपट ,पाखंड ,बकबाद और अपने निहित तुच्छ स्वार्थों की तुष्टि के लिए सामजिक समरसता और लोक कल्याण का ताना बाना विगाड़ने वाले लोगों का बाहुल्य जीवन के समस्त छेत्रों में होने लगता है !मक्खी ,,मच्छर गंदगी में ही पैदा  होते हैं ! उनके विनाश का प्रथम उपाय तो यह है !कि गन्दगी ही न होने दी जाय और दूसरा उपाय यह है कि पैदा हो जाने के बाद सफाई से और इनको नष्ट करने वाली दबाओं के प्रयोग से इनको नष्ट कर दिया जाय ! लोकतंत्र में इन स्वएतनिष्ठ व्यक्तियों को समाप्त करने के दोनों उपाय जनता के पास हैं !किन्तु जनता से ही निकले हुए लोग जनता के तुच्छ स्वार्थों का उपयोग अपने बड़े स्वार्थ की पूर्ति के लिए करते हैं !इसीलिए आज जो कुछ भी देश में झूठ और छल ,कपट ,और निकृष्ट स्वार्थ का प्रदर्शन हो रहा है !और उनको सफलता भी प्राप्त हो रही है !वह सब जनता के सहयोग से ही हो रहा है ! अभी भी कुछ देश भक्त इस स्वार्थनिष्ठ लोगों के गंदे खेल के विरुद्ध प्रयत्नशील हैं !किन्तु उनके प्रयत्न उसी प्रकार सफल नहीं हो पा रहे हैं !जैसे आंधी में आँख खोल कर चलना मुश्किल होता है  ! फिर भी बे विपरीत परिस्थितयों में भी समाज के व्यापक हित के लिए कार्यरत हैं !ये कौन लोग हैं ? ऐसे लोग जीवन के सभी छेत्रों ,में ,सभी ,धर्मों ,में और सभी जातियों और वर्गों में है ,!जो अपने लोकहितकारी स्वभाव के कारण सक्रिय हैं ! किन्तु रावण की अन्याय कारी  व्यबस्था में में बे विभीषण जैसे अकेले हैं !  जब तक रावण ने लात मारकर विभीषण को लंका से बाहर नहीं किया था !तब तक लंका में विभीषण भी रह रहा था और रावण की अन्यायी व्यबस्था भी चल रही थी लेकिन  जिस दिन विभीषण लंका से लात खाकर श्री राम की शरण में चला गया था !उसी दिन से लंका की राक्छ्सी व्यबस्था का अंत शरू हो  गया था ! अभी ये स्वार्थनिष्ठ लोग समाजनिष्ठ लोगों को किसी ना किसी प्रकार से साथ लिए हुए हैं और उनका सहयोग प्राप्त कर रहे हैं !यही उनकी चाल है और उनकी सफलता का सूत्र है !इसीलिए विनोबा जी से जब सत्ता में बैठे राजनेता या विपक्छ में कार्य रत नेता मिलने और उनका आशीर्वाद लेने जाते थे तो बे कहते थे !राजनीती त्यागो और बुद्ध ,महावीर  और राम की तरह लोकहित के लिए निकल पडो ! राजनीति अब काल वाह्य हो गयी है !अब लोकनीति का समय है ! धर्मगुरुओं से बे कहते थे !अब धर्म जोड़ता नहीं बल्कि तोड़ता है !इसीलिए अध्यत्मनिष्ठ बनो !और धार्मिक और मजहवी संकीर्णताओं  को त्याग दो ! इसीलिए जब तक राजनीति को देशभक्तों का सहयोग और समर्थन प्राप्त होता रहेगा !तब तक स्वार्थनिष्ठ ,सत्ता परस्त नेताओं से देशमुक्त नहीं हो पायेगा !और जब तक जनता इन धार्मिक और मजहबी साम्प्रदायिक संकीर्णताओं से मुक्त नहीं होगी !तब तक ना कश्मीर में शांति स्थापित होगी और ना हिंदुस्तान पाकिस्तान विवाद शांत होगा !दोनों देशो की जनता इस झूठ के मकड़ जाल  में फंस कर इन मगरमच्छों  की हिंसक दान्तों  में फॅस कर काल कवलित होती रहेगी ! 

No comments:

Post a Comment