दिसम्बर का महीना था !ठण्ड पूरीशक्ति से क्या मनुष्य ,क्या पशु और क्या छोटे बड़े जीव जंतु सभी को अपने आगोश में लेकर पीड़ा दे रही थी !कुछ दिनों से कुहरे और ठंडी हवाओं ने ठण्ड का प्रकोप और बढ़ा दिया था !कुछ दिनों के बाद सूर्यनारायण के दर्शन हुए !लोग शीत से बचाव के लिए सूर्य का ताप ग्रहण करने के लिए घर के बाहर चबूतरों पर या लॉन में बैठकर गर्मी लेने लगे !एक मेढक जो शीत से व्याकुल था ,वह भी मैदान में सूर्य की ताप से शीत निवारण कर रहा था !इतने मैं तीन मेढक और आये और एक एक कर पहले वाले मेढक की पीठ पर चढ़ने लग गये ! दो मेढक तो पहले वाले मेढक की पीठ पर चढ़ गये !तीसरा निराश हो कर चला गया ! सबसे ऊपर जो मेढक बैठा था !उसे जब यह भरोसा हो गया ,की अब मेरी पीठ पर और कोई नहीं बैठ पायेगा ! तब उसने कहा --- चिगम, चिगम ,दूसरे ने कहा ख़ुशी ना गम ( अर्थात अगर तुम मेरी पीठ पर सबार हो ,तो मैं भी किसी की पीठ पर सबार हूँ !नीचे बाला मेढक रोते हुए चिल्लाया ,मरे ससुरजू हम ! ( सिर्फ हम ही एकमात्र अभागे हैं जिसकी पीठ पर बैठ कर तुम चटकारे लेकर ख़ुशी मना रहे हो और हम तुम दोनों का भार ढोरहे हैं ,रो रहे हैं ,चिल्ला रहे हैं, और तुम्हारे सत्ता के मद से बहरे हुए कानो तक हमारा रोना नहीं पहुँच रहा है ) उसके रोने की आवाज तीसरे और दूसरे के सुख में अरण्य रोदन बन कर दब गयी ( जंगल में रोने के समान )
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