आजकल गाय का मास वैदिक काल में हिन्दू लोग खाते थे !और विवेकानंद के चित्र के साथ एक शीर्षक में कहा गया है !कि जो हिन्दू गाय का मास नहीं खता था ! वह श्रेष्ठ हिन्दू नहीं समझा जाता था !इस प्रकार से वैदिक धर्म में जो गाय को लोकमाता और अवध्य तथा पूज्य कहा गया है !और गाय की महिमा का गान किया गया है !उसको गलत सिद्ध करने केलिए और गाय के मॉस को खाने को सही बताने के लिए इस प्रकार के भ्रामक लेख प्रकाशित किये जा रहे हैं ! जब सेश्रष्टि बानी है !विविधता इसका स्वरुप रहा है !ब्रक्छ में हजारों पत्ते होते हैं !किन्तु प्रत्येक पत्ता दूसरे पत्ते से भिन्न होता है !पृथ्वी पर अरबों खरबों पेड़ हैं !किन्तु उनके पत्तों तक में समरूपता नहीं है !इस से यह नहीं कहा जा सकता है कि गाय अनादिकाल से सभी के लिए पूज्य और अवध्य रही है !मनुष्यों की भी बलि दी जाती रही है !लेकिन उसको उचित नहीं ठहराया गया है !महाभारत काल में जरासंध १०८ राजाओं की बलि चढ़ाना चाहता था !इसीलिए उसका बध करना पड़ा था !और उसकी कैद से राजाओं की मुक्त करायी गयी थी !इसी प्रकार से यज्ञ में गाय की बलि देने की एक घटना का जिक्र किया गया है ! एक समय किसी यज्ञ शाळा में राजा ने देखा कि एक बैल की गर्दन कटी हुई है ! और वहां बहुत सी गायें यज्ञ शाला के प्रांगण में खड़ी हुई है !यह देख कर राजा बोले ! संसार में समस्त गायों का कल्याण हो ! हिंसा का निषेध करते हुए उन्होंने कहा ! जो धर्म की मर्यादा से भ्रष्ट हो चुके हैं ! मुर्ख हैं नास्तिक हैं ! तथा जिन्हे आत्मा के विषय में संदेह है ! ऐसे लोगों ने ही हिंसा का समर्थन किया है ! मनुष्य अपनी ही इक्छा से यज्ञ की बेदी पर पशुओं का बलदान करते हैं ! ऋषियों ने सम्पूर्ण कर्मो में अहिंसा का ही प्रतिपादन किया है ! अतः विज्ञ पुरुष को उचित है ! कि वह वैदिक प्रमाण से धर्म के सूक्छम स्वरुप का निर्णय करे ! सम्पूर्ण भूतोंके लिए जिन धर्मों का विधान किया गया है ! उनमे अहिंसा ही सबसे बड़ी मानी गयी है ! सुरा आसव मधु मॉस और पशुबलि तथा तिल और चाबल की खिचड़ी इन सब वस्तुओं को धूर्तों ने यज्ञ में प्रचिलित कर दिया है ! उन धूर्तों ने ही अभिमान मोह और लोभ के बाशिभूत होकर इन वस्तुओं के प्रति अपनी लोलुपता प्रगट की है ! वेदों में इनके उपयोग का विधान नहीं है ! ब्राह्मण तो यज्ञ में भगवान विष्णु का ही आदर भाव मानते हैं ! और खीर तथा पुष्प आदि से से ही पूजन करते हैं ! इस प्रकार से यज्ञ में पशु बलि धार्मिक विधान में निषिद्ध थी !चूँकि आज भी कानून के बाद भी क़त्ल होते हैं !बलात्कार होते है !और बहुत से अनेक प्रकार के संगीन अपराध अपराधी करते हैं !इस से यह निष्कर्ष निकाल कर अपराधियों को अपराध करने की खुली छूट नहीं दी जासकती है !क्योँकि अपराध प्राचीन भारत में भी होते थे !!गाय का बध कभी भी वैदिक धर्म में स्वीकृत नहीं रहा है !फिर भी पशुबलि होती थी ! कुछ लोग गाय का मॉस भी खाते रहे होंगे !किन्तु इसकी स्वीकृति वैदिक धर्म नहीं देता है !
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