गांधी के देश में दादरी ----आज कल अधिकांश लेखक भारत में साम्प्रदायिक सद्भाव की मिसाल प्राचीन भारत की व्यबस्था के साथ जोड़कर प्रस्तुत करते हैं !प्राचीन भारत में न तो सम्प्रदाय शब्द था और न सम्प्रदाय थे !और न ही आजकैसी राजयव्यबस्था थी !धर्म था और शाशन बंशानुगत राज्य व्यबस्था से चलता था !उस समय के समाज की आवश्यकताएं और व्यबस्थाएं आज की तरह नहीं थी !आज कैसी समस्याएं भी नहीं थी !सम्प्रदाय शव्द अंग्रेजी शाशन व्यबस्था के कारण भारत में पृविष्ट हुआ !अंग्रेजो के पहले भारत में मुसलमानो की हुकूमत थी !इसीलिए भारत में हिन्दू धर्म के अतिरिक्त इस्लाम भी जुड़ गया !और मुसलिम काल में ही ईसाई धर्म का भी प्रवेश हुआ !ये दोनों धर्म शशक बर्ग के मान ने वालों के थे !इसिलए इनके संरक्छण में ये धर्म विकसित हुए हैं !परिणाम स्वरुप हिन्दू धर्म से परिवर्तित होकर ही अधिकाँश मुसलिम और ईसाई भारत में हैं !मुसलिम और ईसाई धर्म के धार्मिक कर्मकांडों में भी थोड़ा बहुत सनातन धर्म का अंश दिखाई देता हैं !किन्तु अधिकाँश भाग कर्मकांड का सनातन धर्म से उल्टा है !भोजन में इन दोनों धर्मो में मास खाने की स्वतंत्रता है !और मास भक्छण का निषेध नहीं है !इस्लाम में गाय के मास को खाना हलाल बताया गया है !किन्तु सूअर का मास हराम कहा गया है !किन्तु ईसाई धर्म में सूअर और गाय आदि दोनों और अन्य मास भी खाए जाते हैं !अंग्रेजी साहित्य से जिनका मानस शिक्छित और प्रशकिछित है वे वैदिक धर्म का विकृत चित्र प्रस्तुत करते हैं !और इस्लामिक विद्वान भी वैदिक धर्म का विकृत चित्र प्रस्तुत करते हैं !चूँकि इनको इस्लाम को भारत में प्रभावी बनाना था !इसीलिए वैदिक संस्कृति को विकृत रूप में प्रस्तुत करना आवश्यक था !इसीलिए इन्होने पहले तो वैदिक धर्म के मूल स्वरुप को बिगाड़ा !फिर वर्णाश्रम का विकृत रूप प्रस्तुत किया !जैसा की प्राचीन भारत में नहीं था !और अब गाय का मास प्राचीन भारत में ऋषि मुनि और ब्राह्मण तथा सभी लोग खाते थे !ये सिद्ध कर गाय के मॉस की बिक्री और हत्या पर प्रितिबंध न लगे !इसीलिए फिर गाय के सम्बन्ध में गलत और मनगढंत तथ्य प्रस्तुत कर रहे हैं !भारत अनादि काल से कृषि प्रधान देश रहा है !इसीलिए इस के निबासियों के खान पान में मॉस भक्छण प्रधान नहीं रहा है !और न ही सनातन धर्मी हमेशा और प्रितिदिन मॉस का भक्छण करते थे !शाकाहारी भोजन ही यहाँ के निबासियों का प्रधान भोजन रहा है !शाकाहारी भोजन के ५६ प्रकार के व्यंजनों का प्रादुर्भाव भारत भूमि में ही हुआ है !और इसी प्रकार का भोग भगवान को अर्पित किया जाता है !कुछ जातियां मास भक्छी रही हैं !किन्तु बे भी नित्य और अनिवार्य रूप से मॉस भक्छी नहीं थे !राजा लोग शिकार में कभी कभी हिरन और हिंसक पशुओं का शिकार करते थे !और हिरन आदि का शिकार करते थे !किन्तु गाय का बध नहीं किया जाता था !गाय को अवध्य माना गया था !तथा वेद में गाय को विश्व माता कहा गया था !महाभारत काल में राजाओं के पास भी लाखों गाये पली हुई थी !भगवान श्री कृष्णा ने गीता में भी दो स्थानो पर गाय का उल्लेख किया है !उन्होंने १०(२८)में तो कामधेनु (गाय )को अपना स्वरुप बताकर उसको महत्ता प्रदान की है !और १८ (४४)में खेती गाय की रक्छा और वाणिज्य वैश्य का स्वाभाविक कर्म बताया है !भारत में यज्ञ में पशुबलि दी जाती थी !उसमे गाय और बेल की भी बलि दी जाती थी !इसीलिए इनका मास प्रसाद रूप में ग्रहण करने की पद्धति थी !किन्तु इस प्रकार के यज्ञ आम तौर पर नहीं होते थे !ये यज्ञ राजा लोग आयोजित कराते थे !और इन यज्ञों का विधि विधान से क्रियानबन ब्राह्मण करते थे !इसीलिए उसमे पशुबलि राजाओं को शक्ति प्रदान करने के लिए दी जाती थी !और प्रसाद रूपमे सभी इसको ग्रहण करते थे !किन्तु आज से लगभग ५००० बर्ष पूर्व इसको भी बंद करदिया गया था !भगवान बुद्ध ने पशुबलि के विरुद्ध आंदोलन चलाया था !इसके पूर्व भगवान श्री कृष्ण ने गायें चराकर यज्ञों में पशुबलि की प्रथा को समाप्त करा दिया था !इस्लाम और ईसाई धर्मो का उदय उस स्थान पर हुआ जहाँ मास भक्छण जीवन के लिए अनिवार्य था !उन छेत्रों में कृषि को प्रधानता नहीं थी !सभी लोग मासा हारी थे !आज भी अधिकाँश मुसलिम देश कृषि प्रधान नहीं है !इसी प्रकार ईसाई देशों में भी कृषि कार्य बहुत कम लोग करते हैं !इन दोनों धर्मों के लोग मास भक्छी है !किन्तु भारत में ऐसा नहीं है !गांधी जी भी गाय भक्त थे !बे कहते थे कि जब गाय की गर्दन पर कुल्हाड़ी चलती है !तो मुझे ऐसा लगता है कि कुल्हाड़ी मेरी गर्दन पर चल रही है !हिन्द स्वराज्य में उन्होंने गाय के मास पर अपने विचार व्यक्त किये हैं !बे भी चाहते थे की गाय का बध न हो !किन्तु बे किसीभी प्रकार के गाय के नाम पर किसी भी धर्म पर दबाव डालने के पक्छ में नहीं थे !देवनार में बिगत ४० साल से सर्वोदयी गांधी जन गाय के बध के विरुद्ध धरना दे रहे हैं !इसीलिए गाय के बध को लेकर इस तरह की विकृत व्याख्या प्रस्तुत नहीं करनी चाहिए ! कि प्राचीन भारत में गाय का मास भक्छण आमतौर पर खाया जाता था !भले ही आज की परिस्थितियों में गाय का क़त्ल न रोका जा सके !किन्तु गाय के बध का औचित्य सिद्ध करने के लिए वैदिक धर्म को गाय का मास भक्छी के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए !
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