Friday, 23 October 2015

व्योहारिक ज्ञान -----(१)जो दूसरों के धन ,रूप ,पराक्रम ,कुलीनता , सुख ,सौभाग्य ,और सम्मान पर डाह करता है !उसका यह रोग असाध्य है !
(२)विद्या का मद ,धन का मद और ऊँचे कुल का मद ये घमंडी पुरुषों के लिए तो मद हैं !किन्तु सज्जन पुरुषों के लिए ये लोकहित के साधन है !
(३)संसार में धनियों में प्रायः भोजन को पचाने की शक्ति नहीं होती है ! किन्तु दरिद्रों के पेट में काठ भी पच जाता है !
(४)पतन की ओर उन्मुख मनुष्य की बुद्धि का नाश हो जाता है  !और उसका ध्यान नीच कर्मों के करने में लग जाता है !विनाश काल उपस्थित होने पर बुद्धि मलिन हो जाती है !फिर न्याय के समान मालुम होने वाला अन्याय उसके ह्रदय से बाहर नहीं निकलता है !
(५) देवतालोग  चरबाहे की तरह डंडा लेकर किसी का पहरा नहीं देते  हैं ! बे जिसकी रक्छा करना चाहते हैं ! उसे उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं ! मनुष्य जैसे जैसे लोकहित के कामों में मन लगाता है  !वैसे वैसे ही उसके सारे अभीष्ठ  सिद्ध होना शुरू हो जाते हैं !इसमें जरा भी संदेह नहीं है !
(६)कपट पूर्ण कार्य करने वाले मायाबी पाखंडी व्यक्ति को धर्म पापों से मुक्त नहीं करता है !जैसे पंख निकल आने पर चिड़ियों के बच्चे घौंसला छोड़ देते हैं ! उसी प्रकार धर्म भी उस मायाबी का त्याग कर देता है !
(७)घरों में आग लगाने वाला ,बिष देने वाला ,प्रसाद बेचने वाला ,हथ्यार बनाने वाला ,नाजायज संतान की कमाई खाने वाला ,चुगली करने वाला ,मित्र द्रोही ,परस्त्री लम्पट ,गर्भ की भ्रूण हत्या करने वाला ,गुरु की पत्नी से समागमकरने वाला ब्राह्मण होकर शराब पीने वाला ,अधिक तीखे स्वाभाव बाला ,कौवे की तरह काओं  काओं करने वाला ,नास्तिक ,वेदों की निंदा करने वाला ,ग्राम पुरोहित ,यजोपवीत बिहीन पिता  का पुत्र क्रूर तथा शक्तिबान होते हुए भी --मेरी रक्छा करो, इस प्रकार कहने वाले का वध करने वाले शरणागत का जो बध करता है ---- प्राचीन काल में भारत में ये सब के सब ब्रह्म हत्यारों के समान माने जाते थे !
(८)आग में तपाने से स्वर्ण की पहचान होती है ! सदाचार से सत्पुरुष की, व्योहार से श्रेष्ठ पुरुष की ,भय प्राप्त होने पर शूरवीर की ,आर्थिक कठिनाई में धीर पुरुष की ,और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्छा होती है !
(९)बुढ़ापा सुन्दर रूप को ,आशा धैर्य को ,मृत्यु प्राणो को ,गुणों में दोष देखने का स्वभाव धर्माचरण को ,क्रोध लक्छमी को ,नीच पुरुषों की सेवा सत स्वभाव को कामवासना लज्जा को और अभिमान सम्पूर्ण गुणों को नष्ट कर दता है !
(१०)शुभ कर्मों से लक्छमी  उत्पन्न होती है ,प्रगल्भता से वह बढ़ती है ,चतुरता से जड़ जमा लेती है ,और संयम से सुरक्छित रहती है !
(११)आठ गुण पुरुष की शोभा बढ़ाते हैं ---बुद्धि ,श्रेष्ठ आचरण ,शास्त्र ज्ञान ,पराक्रम , बहुत ना बोलना ,यथाशक्ति दान देना ,और कृतज्ञ होना !

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