Sunday, 11 October 2015

वैदिक धर्म में प्रयोगों के उपरांत  जिन भोज्य पदार्थों का आविष्कार किया गया है !  उनमे अत्यंत उत्तम भोजन के पदार्थों का वर्णन श्रीकृष्ण ने गीता में १७ (८)में करते हुए कहा है ! आयु सत्त्वगुण बल आरोग्य सुख और प्रसन्नता बढ़ने वाले बहुत समय तक शक्ति वर्धन करने वाले ह्रदय को शक्ति देने वाले रसयुक्त तथा चिकने भोजन के पदार्थ सात्त्विक मनुष्य को प्रिय होते हैं! !इन भोजन के पदार्थों में घी दूध फल सूखे मेवे आदि को शामिल  किया गया है जिनसे शरीर में रोगों का प्रवेश ही नहीं हो पाता है !इसके विपरीत जो बीमारी और दूषित मानसिकता , मनोविकाारों को उत्पन्न करने वाले भोजन के पदार्थ हैं उनका वर्णन १७ (१०)में किया गया है ! जो भोजन सड़ा हुआ रस रहित दुर्गन्धित बासी और महान अपवित्र (अंडे मास आदि)है वह भोजन रोगों और दूषित मनोविकारों को उत्पन्न करने वाला होता है !ब्रेड इसी भोजन में शामिल है !भारत में अधिकांश भोजन ताजा  तथा घी दूध आदि पदार्थों से निर्मित होते थे !ताजी रोटी सब्जी मिठाईयों में रसगुल्ला कलाकंद मक्खन रबड़ी आदि खाए जाते रहे हैं !गाय भेंस बकरी के मास भक्छण नेगाय सूअर की चर्वी से बने   !चॉकलेट को ला दिया !

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