व्योहारिक ज्ञान ----- (१)संसार में ये ८ गुण स्वर्गलोक का दर्शन कराने वाले हैं ! इनमे से ४ तो संतों में ही पाये जाते हैं ---- जो वास्तव में संत हैं ! उनमे ये सदा विद्यमान रहते हैं ! और ४ सज्जन पुरुषों के आचरण में दिखाई देते हैं लोकहित के लिए समर्पित जीवन का प्रत्येक कार्य ,दान ,स्वाध्याय ,और कर्तव्यपालन ---ये ४ सज्जनो के साथ हमेशा रहते हैं ! और इन्द्रियनिग्रह ,सत्य ,सरलता ,और कोमलता -----इन चारों का संत लोग अनुसरण करते हैं !
(२)सम्पूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा का दर्शन ,स्वाध्याय ,दान ,तप ,सत्य छमा ,दया और निर्लोभता ---- ये धर्म के ८ प्रकार के मार्ग बताये गए है ! इनमे से सम्पूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा का दर्शन ,स्वाध्याय ,दान और तप तो कोई दिखाबटी और दम्भी भी कर सकता है ! परन्तु सत्य ,छमा ,दया और निर्लोभता तो जो महात्मा या वास्तविक संत नहीं है उनमे रह ही नहीं सकते हैं !
(३)जिस सभा में बड़े बूढे नहीं हैं ! वह सभा नहीं है ! जिन्होंने जीवन में कर्तव्य का पालन निष्ठा पूर्वक ईमानदारी से नहीं किया ! बे आयु से बृद्ध होने के बाद भी बृद्ध नहीं है ! जिन बृद्धों के आचरण में धर्म तो दिखाई देता है ! किन्तु सत्य के दर्शन नहीं होते है ! उनका वह आचरण धार्मिक नहीं है !और जो सत्य कपट मिश्रित हो वह सत्य नहीं है !
(४)पाप से कीर्ति प्राप्त करने वाले मनुष्य पाप का आचरण करते हुए पाप के फलों को ही प्राप्त करते हैं ! और समाज में दम्भ ,पाखंड की निन्दित परम्पराओं को जन्म देते हैं ! और पुण्य तथा स्वार्थ रहित कर्मों से प्राप्त पुण्यकीर्ति वाले मनुष्य पुण्यफल का ही उपभोग करते हैं !
(५)कीर्ति प्राप्त करने के लिए मनुष्यों को पाप से कीर्ति नहीं उपार्जित करनी चाहिए ! क्योँकि लगातार पाप कर्मों में लिप्त रहने से बुद्धि का नाश हो जाता है ! जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है ! वह मनुष्य फिर पाप परायण जीवन ही जीने लगता है ! और वह सामाजिक जीवन में पाप की ही बृद्धि करता रहता है !
(६)जिन मनुष्यों की बुद्धि और विवेक का नाश नहीं होता है ! वे मनुष्य सदा पुण्यकार्यों में ही संलग्न रहते हैं ! इस प्रकार के मनुष्य पुण्य कार्य करते हुए संसार में कर्तव्य पालन की परम्परा का सृजन और पोषण करते हुए समाज को रचनात्मक दिशा देकर अंत में शांति पूर्वक देह त्याग कर पुण्यलोकों में जाते हैं !
(७)गुणों में दोष देखने वाले ,दुष्ट वचनो और कार्यों से मनुष्यों के मर्म पर आघात करने वाले ,निर्दयी ,अनावश्यक शत्रुता करने वाले ,और शठ पाप का आचरण करते हैं ! और बे शीघ्र ही महान कष्ट को प्राप्त होतेहैं!
(८)दोष दृष्टि से रहित शुद्ध बुद्धि वाले मनुष्य हमेशा शुभ कर्मों का अनुष्ठान करते हुए महान सुख को प्राप्त होते हैं ! और सर्वत्र उनका ह्रदय से सम्मान होता है !
(९)जो बुद्धिमान विवेक बुद्धि से युक्त पुरुषों से सद्बुद्धि प्राप्त करते हैं ! वे ही वास्तव में पंडित है ! क्योँकि विवेकबान पुरुष ही धर्म से प्राप्त अध्यात्म और अर्थ को प्राप्त कर अनायास ही अपनी उन्नति करने में समर्थ होते हैं !
(१०)युवाबस्था में ऐसे कर्म करे जिस से बृद्धअवस्था में सुख पूर्वक रह सके ! और जीवन भर ऐसे कर्म करे जिस से मृत्यु के बाद भी परलोक में सुख से रह सके !
(११)अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाए जाते हैं ! बे तो छिपते नहीं हैं ! परन्तु दोष छिपाने के कारण नए दोष प्रगट हो जाते हैं!
(२)सम्पूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा का दर्शन ,स्वाध्याय ,दान ,तप ,सत्य छमा ,दया और निर्लोभता ---- ये धर्म के ८ प्रकार के मार्ग बताये गए है ! इनमे से सम्पूर्ण प्राणियों में एक ही आत्मा का दर्शन ,स्वाध्याय ,दान और तप तो कोई दिखाबटी और दम्भी भी कर सकता है ! परन्तु सत्य ,छमा ,दया और निर्लोभता तो जो महात्मा या वास्तविक संत नहीं है उनमे रह ही नहीं सकते हैं !
(३)जिस सभा में बड़े बूढे नहीं हैं ! वह सभा नहीं है ! जिन्होंने जीवन में कर्तव्य का पालन निष्ठा पूर्वक ईमानदारी से नहीं किया ! बे आयु से बृद्ध होने के बाद भी बृद्ध नहीं है ! जिन बृद्धों के आचरण में धर्म तो दिखाई देता है ! किन्तु सत्य के दर्शन नहीं होते है ! उनका वह आचरण धार्मिक नहीं है !और जो सत्य कपट मिश्रित हो वह सत्य नहीं है !
(४)पाप से कीर्ति प्राप्त करने वाले मनुष्य पाप का आचरण करते हुए पाप के फलों को ही प्राप्त करते हैं ! और समाज में दम्भ ,पाखंड की निन्दित परम्पराओं को जन्म देते हैं ! और पुण्य तथा स्वार्थ रहित कर्मों से प्राप्त पुण्यकीर्ति वाले मनुष्य पुण्यफल का ही उपभोग करते हैं !
(५)कीर्ति प्राप्त करने के लिए मनुष्यों को पाप से कीर्ति नहीं उपार्जित करनी चाहिए ! क्योँकि लगातार पाप कर्मों में लिप्त रहने से बुद्धि का नाश हो जाता है ! जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है ! वह मनुष्य फिर पाप परायण जीवन ही जीने लगता है ! और वह सामाजिक जीवन में पाप की ही बृद्धि करता रहता है !
(६)जिन मनुष्यों की बुद्धि और विवेक का नाश नहीं होता है ! वे मनुष्य सदा पुण्यकार्यों में ही संलग्न रहते हैं ! इस प्रकार के मनुष्य पुण्य कार्य करते हुए संसार में कर्तव्य पालन की परम्परा का सृजन और पोषण करते हुए समाज को रचनात्मक दिशा देकर अंत में शांति पूर्वक देह त्याग कर पुण्यलोकों में जाते हैं !
(७)गुणों में दोष देखने वाले ,दुष्ट वचनो और कार्यों से मनुष्यों के मर्म पर आघात करने वाले ,निर्दयी ,अनावश्यक शत्रुता करने वाले ,और शठ पाप का आचरण करते हैं ! और बे शीघ्र ही महान कष्ट को प्राप्त होतेहैं!
(८)दोष दृष्टि से रहित शुद्ध बुद्धि वाले मनुष्य हमेशा शुभ कर्मों का अनुष्ठान करते हुए महान सुख को प्राप्त होते हैं ! और सर्वत्र उनका ह्रदय से सम्मान होता है !
(९)जो बुद्धिमान विवेक बुद्धि से युक्त पुरुषों से सद्बुद्धि प्राप्त करते हैं ! वे ही वास्तव में पंडित है ! क्योँकि विवेकबान पुरुष ही धर्म से प्राप्त अध्यात्म और अर्थ को प्राप्त कर अनायास ही अपनी उन्नति करने में समर्थ होते हैं !
(१०)युवाबस्था में ऐसे कर्म करे जिस से बृद्धअवस्था में सुख पूर्वक रह सके ! और जीवन भर ऐसे कर्म करे जिस से मृत्यु के बाद भी परलोक में सुख से रह सके !
(११)अधर्म से प्राप्त हुए धन के द्वारा जो दोष छिपाए जाते हैं ! बे तो छिपते नहीं हैं ! परन्तु दोष छिपाने के कारण नए दोष प्रगट हो जाते हैं!
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