गोमांस के भक्छण का निषेध ------ जो क्रूर मनुष्य मॉस बेचने के लिए गाय का बध करता है ! या गाय का मास खाता है ! तथा जो स्वार्थ बश गाय की हत्या करने वाले को गाय का बध करने की सलाह देते हैं ! बे सभी मनुष्य महान पाप के भागी होते हैं ! गाय की हत्या करने वाले उसका मास खाने वाले तथा गाय की हत्या का समर्थन करने वाले लोग गाय के शरीर में जितने रोएँ होते है ! उतने बर्षों तक जहन्नुम में पड़ेरहते हैं ! बे सभी महान पापी और नरकगामी होते हैं !भीष्म पितामह ने युधिस्ठर से कहा ---ब्रह्म वादी महात्माओं ने हिंसा दोष के तीन कारण बताये हैं --- मन (मास खाने की इक्छा )वाणी (मास खाने का उपदेश देना )और आस्वाद (प्रत्यक्छ रूप में मास का स्वाद लेना ) ये तीनो ही हिंसा दोष के आधार हैं !जो मुर्ख यह जानते हुए भी कि अपने पुत्र के मास में और दूसरे साधारण मास में कोई अंतर नहीं है ! जीभ के स्वाद के लिए मास खाता है वह नराधम है ! दूसरों के धन धन्य का नाश करने वाले तथा मास भक्छण की प्रसंसा करने वाले मनुष्य सदा ही स्वर्ग से बहिस्कृत रहते हैं ! जो मास के स्वाद में होने वाली आसक्ति से अभिभूत होकर मास की अभिलाषा करते हैं तथा उसके बार बार गुण गाते हैं उन्हें ऐसी दुर्गति की प्राप्ति होती है जिसका बाणी द्वारा वर्णन नहीं किय जा सकता है ! जो मनुष्यों के शरीर मृत्यु के बाद जला दिया जाता है ! अथवा किसी हिंसक प्राणी का भोजन बनकर उसकी विष्ठा में परिणित हो जाता है ! या योँ ही फेक दिया जाता है जिस से उसमे कीड़े पड़ जाते हैं ! -----इन तीनो मेसे कोई ना कोई परिणाम जिस शरीर के लिए निश्चित है ! उस शरीर को विद्वान पुरुष गाय आदि को पीड़ा देकर उसके मास से कैसे पोषण कर सकता है ?मास की प्रसंसा भी पाप मय कर्मफल से जोड़ देती है !उस मास का भक्छण करना कैसे स्वीकृत धर्मानुसार और मनुष्त्व की दृष्टि से अनुमोदित और गाहय किया जा सकता है !यह उपदेश महाभारत में भीष्म पितामह ने युधिस्ठर को दिया है !जो लीग स्वार्थ बस वैदिक धर्म में मास भक्छण की बात कर रहे हैं !बे मनुष्यों में अधम है
No comments:
Post a Comment