व्योहारिक ज्ञान ----(१)जिनका मन पाप कर्मों में लगा रहता है !बे लोग दूसरों के कल्याण मय
गुणों को जानने की वैसी इक्छा नहीं रखते जैसी की उनके अवगुणो की जानने की रखते हैं !
(२)जो अर्थ की पूर्ण सिद्धि चाहता हो उसे धन के उपार्जन में लोकहित का ध्यान प्रमुखता से रखना चाहिए !जो जनहित को छति पहुंचा कर धन का उपार्जन और संपत्ति का संग्रह करता है !वह मुर्दे में उत्पन्न कीड़ों के समान नष्ट हो जाता है !
(३)जिसकी बुद्धि पाप कर्मों से हटकर लोक कल्याण के कार्यों में लग जाती है !वही मनुष्य संसार के सृजनात्मक और विध्वंसक स्वरुप को समझ कर नव निर्माण की परम्परा और प्रक्रिया को जन्म देने मे सफल होता है !
(४) जो मनुष्य समयानुसार धर्म, धन और काम का नियमानुसार सेवन करता है ! वही इस लोक में और परलोक में भी धर्म अर्थ और काम को प्राप्त करता है !
(५)जो मनुष्य क्रोध और हर्ष के उठे हुए बेग को नियंत्रण करना जानता है ! और आपत्ति काल में भी घबड़ाता नहीं है वही मनुष्य सफलता पूर्वक जीवन जीने की कला जानता है !
(६)मनुष्यों में सदा पांच प्रकार का बल होता है ! जो बाहुबल नामक प्रथम बल है ,वह निकृष्ट बल कहलाता है ! अच्छे सलाह कार से मिलने वाली सलाह दूसरा बल है ! मनीषी लोग धन के लाभ को तीसरा बल बताते हैं ! तथा जो बाप दादों से प्राप्तहुआ मनुष्य का स्वाभाविक बल है ! वह अभिजात नामक चौथा बल है ! जिससे इन सभी बलों का संग्रह होता है तथा जो सभी बलों में श्रेष्ठ बल है ! वह पांचवां बुद्धि का बल कहलाता है !
(७)बुद्धिमान मनुष्य राजनेता ,सांप ,पढ़े हुए पाठ, सामर्थ्यशाली व्यक्ति, शत्रु , भोग सामग्री और आयु पर पूर्ण विश्वास नहीं करते हैं !इन सभी का सावधानी पूर्वक अनासक्ति भाव से सेवन करते हैं !इनका स्वभाव स्वरुप कभी स्थायी और एकसा नही रहता है !
गुणों को जानने की वैसी इक्छा नहीं रखते जैसी की उनके अवगुणो की जानने की रखते हैं !
(२)जो अर्थ की पूर्ण सिद्धि चाहता हो उसे धन के उपार्जन में लोकहित का ध्यान प्रमुखता से रखना चाहिए !जो जनहित को छति पहुंचा कर धन का उपार्जन और संपत्ति का संग्रह करता है !वह मुर्दे में उत्पन्न कीड़ों के समान नष्ट हो जाता है !
(३)जिसकी बुद्धि पाप कर्मों से हटकर लोक कल्याण के कार्यों में लग जाती है !वही मनुष्य संसार के सृजनात्मक और विध्वंसक स्वरुप को समझ कर नव निर्माण की परम्परा और प्रक्रिया को जन्म देने मे सफल होता है !
(४) जो मनुष्य समयानुसार धर्म, धन और काम का नियमानुसार सेवन करता है ! वही इस लोक में और परलोक में भी धर्म अर्थ और काम को प्राप्त करता है !
(५)जो मनुष्य क्रोध और हर्ष के उठे हुए बेग को नियंत्रण करना जानता है ! और आपत्ति काल में भी घबड़ाता नहीं है वही मनुष्य सफलता पूर्वक जीवन जीने की कला जानता है !
(६)मनुष्यों में सदा पांच प्रकार का बल होता है ! जो बाहुबल नामक प्रथम बल है ,वह निकृष्ट बल कहलाता है ! अच्छे सलाह कार से मिलने वाली सलाह दूसरा बल है ! मनीषी लोग धन के लाभ को तीसरा बल बताते हैं ! तथा जो बाप दादों से प्राप्तहुआ मनुष्य का स्वाभाविक बल है ! वह अभिजात नामक चौथा बल है ! जिससे इन सभी बलों का संग्रह होता है तथा जो सभी बलों में श्रेष्ठ बल है ! वह पांचवां बुद्धि का बल कहलाता है !
(७)बुद्धिमान मनुष्य राजनेता ,सांप ,पढ़े हुए पाठ, सामर्थ्यशाली व्यक्ति, शत्रु , भोग सामग्री और आयु पर पूर्ण विश्वास नहीं करते हैं !इन सभी का सावधानी पूर्वक अनासक्ति भाव से सेवन करते हैं !इनका स्वभाव स्वरुप कभी स्थायी और एकसा नही रहता है !
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