करण को परशुराम के श्राप के कारण ब्रह्मस्त्र का बिस्मरण हो गया था ! भगवांन परशुराम ने श्राप देते हुए कहा था ! कि तूने छल करके यह ब्रह्मास्त्र प्राप्त किया है ! इसलिए काम पड़ने पर तेरा यह अस्त्र तुझे याद नहीं रहेगा ! तेरी मृत्यु के समय को छोड़कर अन्य अवसरों पर ही यह अस्त्र तेरे काम आसकता है ! इस श्राप के अतिरिक्त एक और श्राप उसको प्राप्त हुआ था !करण ने इन दोनों श्रापों की बात स्वयं महाभारत के युद्ध में शल्य को बतायी थी ! करण ने कहा एक समय की बात है ! मेँ शस्त्रों के अभ्यास के लिए विजय नामक एक ब्राह्मण के आश्रम के आस पास विचरण कर रहा था ! उस समय घोर एवम भयंकर वाण चलाते हुए मेने अनजान में ही असाबधानी के कारण एक ब्राह्मण की गाय के बछड़े को एक बाण से मार दिया ! उस ब्राह्मण ने मुझ से आकर कहा तू,ने मेरे गाय के बछड़े को मार दिया है ! इसलिए तुम जिस समय युद्ध भूमि में युद्ध करते करते अत्यंत संकट को प्राप्त होगे ! उसी तुम्हारे रथ का पहिया जमीन में धस जाएगा ! मेने ब्राह्मण को १०००गायेन और ६०० बैल लेने के लिए प्रार्थना की ! किन्तु उसकी कृपा नहीं पा सका ! मेने उस से अपने अपराध के लिए छमा भी मांगी ! तब ब्राह्मण ने कहा करण मेने जो कह दिया है ! वह बैसा ही होकर रहेगा वह पलट नहीं सकता है ! असत्य भासण प्रजा का नाश कर देता है ! अतः मै झूठ बोलने से पाप का भागी नहीं बनूगा इसलीए धर्म की रक्छा के उद्देश्य सेमें मिथ्या भासण नहीं कर सकता हूँ !तुम लोभ देकर ब्राह्मण की उत्तमगति का विनाश ना करो ! तुमने पश्चाताप और दान द्वारा उस बछड़े के बध का प्रायश्चित कर लिया ! जगत में कोई भी मेरे कहे हुए वचन को मिथ्या नहीं कर सकता है ! इसीलिए मेरा श्राप तुझे प्राप्त अवश्यही होगा !परिणाम स्वरुप मृत्यु का अवसर आने पर भगवान परशराम के श्राप के कारण उसे ब्रह्मास्त्र का विस्मरण हो गया था !और ब्राह्मण के श्राप के कारण उसके रथ का पहिया जमीन में धस गया था !
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