व्योहारिक ज्ञान ------(१)छमाशील पुरुषों पर एक ही दोष का आरोप लगाया जाता है ! वह दोष यह है कि छमाशील मनुष्य को लोग असमर्थ समझ लेते हैं ! किन्तु छमाशील पुरुष का वह दोष नहीं मानना चाहिए ! क्योँकि छमा बहुत बड़ा बल है ! छमा असमर्थ पुरुषों का गुण और समर्थों का भूसण है ! इस जगत में छमा वशीकरण रूप है ! भला छमा से क्या सिद्ध नहीं होता है ! जिसके हाथ में छमा रूपी तलबार है ! उसका दुष्ट पुरुष क्या कर लेंगे ? केवल धर्म ही परम कल्याण कारक है ! छमा धर्म की ही संतान है ! इसलिए छमा ही एक मात्र शांति का सर्व श्रेष्ठ उपाय है ! आत्म विद्या ही परम संतोष प्रदान करती है ! और अहिंसा से ही जीवों का पोषण संरक्छण और समस्त सुखों की प्राप्ति होती है !जीव हत्या निषेध से परम सुख की प्राप्ति होती है ! और प्राणियों में सद्भाव होता है !सुख शांति और कल्याण प्राप्ति का अन्य कोई उपाय आज तक खोजा नहीं जा सका है !जो धर्म किसी भी रूप स्वरुप में हिंसा का समर्थन करता है पोषण और संरक्छण देता है ! वह धर्म नहीं अधर्म है ! धर्म का जन्म प्राणियों को धारण करने के लिए हुआ है ! उनके विनाश के लिए नहीं !
(२)समुद्र पर्यन्त इस सारी पृथ्वी में ये दो प्रकार के अधम पुरुष हैं ---अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपंच कर्मो में लगा हुआ सन्यासी !
(३)जरा भी कठोर ना बोलना और दुष्ट पुरुषों का सम्मान न करना ----इन दो कामों का करने वाला मनुष्य संसार में विशेष शोभा पता है !
(४)दो प्रकार के पुरुष सूर्य मंडल को भेद कर ऊर्धव गति को प्राप्त होते हैं ----योग युक्त सन्यासी और युद्ध में शत्रुओं के सम्मुख युद्ध करके मारा गया सैनिक योद्धा !
(५)मनुष्यों के कार्यों की सिद्धि केलिए उत्तम ,मध्यम ,अधम ----- ये तीन प्रकार के न्यायकूल उपाय सुने जाते हैं उत्तम मध्यम और अधम तीन ही प्रकार के मनुष्य भी होते हैं ! इनको यथा योग्य तीन ही प्रकार के कार्यों में लगाना चाहिए !
(६)दूसरे के धन का हरण !,दूसरे की स्त्री से संसर्ग ! तथा सुहृद मित्र का परित्याग ----ये तीनो ही दोष मनुष्य के आयु धर्म तथा कीर्ति का नाश करने वाले होते हैं !
(२)समुद्र पर्यन्त इस सारी पृथ्वी में ये दो प्रकार के अधम पुरुष हैं ---अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपंच कर्मो में लगा हुआ सन्यासी !
(३)जरा भी कठोर ना बोलना और दुष्ट पुरुषों का सम्मान न करना ----इन दो कामों का करने वाला मनुष्य संसार में विशेष शोभा पता है !
(४)दो प्रकार के पुरुष सूर्य मंडल को भेद कर ऊर्धव गति को प्राप्त होते हैं ----योग युक्त सन्यासी और युद्ध में शत्रुओं के सम्मुख युद्ध करके मारा गया सैनिक योद्धा !
(५)मनुष्यों के कार्यों की सिद्धि केलिए उत्तम ,मध्यम ,अधम ----- ये तीन प्रकार के न्यायकूल उपाय सुने जाते हैं उत्तम मध्यम और अधम तीन ही प्रकार के मनुष्य भी होते हैं ! इनको यथा योग्य तीन ही प्रकार के कार्यों में लगाना चाहिए !
(६)दूसरे के धन का हरण !,दूसरे की स्त्री से संसर्ग ! तथा सुहृद मित्र का परित्याग ----ये तीनो ही दोष मनुष्य के आयु धर्म तथा कीर्ति का नाश करने वाले होते हैं !
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