Tuesday, 20 October 2015

व्योहारिक ज्ञान ------(१) काम क्रोध और लोभ ---- ये तीन आत्मा का नाश करने वाले नरक के द्वार हैं अतः इन तीनो का विवेक पूर्ण उपयोग करना चाहिए !धतूरा जहर होता है !किन्तु वैद्यों द्वारा उसका शोधन होने के बाद उसमे औषधीय गुण प्रगटहो जाते हैं !और घातक ना होकर जीवन रक्छक हो जाता है ! काम के दो स्वरुप होते हैं !कामना और वासना !कामनाएं भौतिक सुख प्राप्ति का साधन होती हैं !ये पद प्रितिस्था धन संपत्ति ऐश्वर्य की प्राप्ति के रूप में मनुष्यों में प्रगट होती हैं !जब इनकी प्राप्ति के लिए  प्रयत्न बिधि विधान और नैतिक साधनो से लोक हित को ध्यान में रख कर किया जाता है !और इनका उपभोग अनासक्ति भाव से विवेक पूर्ण ढंग से कर्तव्य पालन के लिए  किया जाता है !तब ये स्वयं के लिए और समाज के लिए उपयोगी होती हैं !किन्तु जब ये स्वार्थ निष्ठा से व्यक्ति के अहंकार की तुष्टि के लिए उपयोग में प्रयुक्त होती हैं !तब ये आत्मनाश कर मनुष्य को पशु से भी अधिक पतित कर देती हैं !ऐसे मनष्यों का जीवन और आचरण समाज को दूषित कर स्वार्थ निष्ठा को वेग प्रदान करता है !और समाज से नैतिकता परोपकार  और देश हित के भावों का नाश कर देती  है !वासनाएं  स्त्री पुरुष संसर्ग के लिए उत्पन्न होती हैं !ये कभी भी तृप्त नहीं हो सकती हैं !इसलिए इन स्त्री जनित सुख को भी विधि विधान और नैतिक नियमों से नियंत्रित किया गया है !काम के वासना स्वरुप की तृप्ति में मनुष्यों और स्त्रियों की ऊर्जा का विनाश होता है !इसीलिए इसका सीमित और अनुशासित उपयोग सिर्फ संतति के जन्म के लिए ही किया जय !वैदिक संस्कृति में ब्रह्मचर्य की महत्ता  को पहचान कर इसके पालन पर बड़ा जोर दिया गया है !इसीलिए जो गृहस्थ इसका विवेक पूर्ण ढंग से सिर्फ संतति प्रजनन के लिए ही करते हैं !बे उत्तम संतानो को जन्म देते हैं !किन्तु जब वासना बाढ़ की तरह समाज में प्रबाहित होने लगाती है !तब वैश्या बृत्ति बलात्कार जैसे जघन्य अपराध समाज में प्रिचलित और प्रवृत्त होजाते हैं !मनुष्य फिर पशु बन जाता है !क्रोध का भी उचित उपयोग सामजिक दृष्टि से किया जाने पर लाभ दायक होता है !ना अधिक छमा उपयोगी है !और ना अधिक क्रोध !दुष्टों पर क्रोध और सज्जनो और विद्वानो तथा भरणीय और पालनीय कुटुम्बी जनो आदि की त्रुटियों के प्रिति स्नेह पूर्ण दृष्टि क्रोधी व्यक्ति को भी आत्मनाश से बचाती है !लोभ भी गृहस्थ के लिए उचित मात्रा में उपयोगीहै !किन्तु सत्कर्मों में उपार्जित द्रव्य का उपयोग ना करना और उसको आसक्ति पूर्ण बृत्ति से संग्रहीत रखना श्रेय का नाशक है !उपार्जित द्रव्य के दो ही परिणाम होते हैं ! भोग या नाश !इसलिए द्रव्य का भोग लोकहित के कार्यों के लिए करना चाहिए !

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