५(१४)मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है पर कर्मफल भोगने में परतंत्र है
मनुष्य समाज और स्वयं का निर्माण अपने कर्मो द्वारा ही करता है परमात्मा ने
श्रिष्टि निर्माण के पूर्व ही समस्त प्राणियों के जीवन यापन के लिए समुचित
सामग्री की व्यबस्था कर यह अधिकार मनुष्यों को सौंप दिया था की वह समस्त
प्राणियों को उनका उचित भाग प्रदान करे श्रिष्टि में स्त्री और पुरुष दो ही
सर्वाधिक बुद्धि संपन्न जीवधारी उत्पन्न किये गए थे इसलिए श्रिष्टि के
संरक्छण पोषण का कार्य विशेष तौर पर उन्ही का था मनुस्यों
ने अपनी भोग बुद्धि के अनुसार ऐसी व्यबस्था का निर्माण किया की सारी विश्व
व्यबस्था संकट के घेरे में हैं भोग प्रधान जीवन दृष्टि से जीवन जीने वालों
ने एक नयी बात प्राणिमात्र को अपना भोग माध्यम बनाने के लिए इन अधर्मिओं
ने यह बात गढ़ी की संसार में जो विषमता है उसका निर्माता भगवान है उसी की
व्यबस्था के तहत लोग गरीब अमीर है उसी की व्यबस्था में पशुओं पक्षिओं को
मारने का अधिकार हमें प्राप्त हुआ है इस प्रकार सारी अनैतिकता दुस्टता
अन्याय का करता भगवान को बताकर मनमाने तरीके से अन्याय युक्त जीवन जीने का
अनुज्ञा पत्र भगवान से प्राप्त कर लिया विश्व व्यबस्था में भगवान के नाम पर
अशीमित भोग भोगने वालेइन भिन्न भिन्न रूपों में दिखने वाले इन प्राणिमात्र
का शोषण करने वालों ने भगवान के नाम पर थोड़ा बहुत दान पुण्य कर समाज को
कष्ट के गर्त में धकेल कर सारी विश्व व्यबस्था को अपने मनोवांछित भोग
प्राप्ति का साधन बनाकर इसका ठीकरा भगवान के सर पर फोड़ दिया है यहां भगवान
इस व्यापक अन्याय बृत्ति से परमात्मा को पृथक बताते हुए कहते है की
परमेश्वर न तो मनुष्यों के कर्तापन को और न कर्मों को और न कर्म फल संयोग
की ही रचना करते है मनुष्य जो कुछ भी कामकरताहै है वह स्वभाव के अनुसार
करता है उसके कर्म करने में परमात्मा की कोई भूमिका नहीं है
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