५(१०)कर्म करते हुए कर्म मुक्ति के अनेक मार्ग गीता में बताये गए है आखिर
कर्म बंधन से मुक्ति का क्या लाभ है ?कर्म स्वाभाव से ही होते है किन्तु
चाहा गया कर्मफल हमेशा प्राप्त नहीं होता है और यदि होता भी है तो कर्ता
उसको अपने द्वारा किये गए कर्म का फल मान लेता है जो कि सही नहीं है कर्म
चाहे छोटा हो या बड़ा अन्य बस्तुओं व्यक्तिओं के सहयोग से ही पूर्ण होता है
इसलिए कर्मफल के विषय में भ्रामिक समझ का अंत होने से अभिमान का निरसन तथा
स्वस्थ कर्म करने की प्रवृत्ति विकसित होती है कर्म बंधन
से मुक्ति के लिए कर्म फल मुक्ति आवश्यक है यह भौतिक जीवन में सत्कर्म
विकास में सहायक होती है कर्म बंधन मुक्ति का आध्यात्मिक लाभ यह है की
कर्मबंधन से मुक्त व्यक्ति मोक्ष प्राप्ति का अधिकारी हो जाता है और उसके
लिए यह वास्तविक समझ गीता विकसित करती है की जड़ चेतन के रूप में एक मात्र
परमात्मा ही ब्रह्माण्ड में समय हुआ है कर्म सामग्री भी वह है और कर्म का
कर्ता भी वह है इसलिए समस्त कर्म परमात्मा को सम्पर्पित कर अपने आपको कर्म
फल से पृर्थक रख कर कर्म करने से वह उसी प्रकार मुक्त रहेगा जैसे जल में
रहते हुए भी कमल जल से मुक्त रहता है कर्म फल की मुक्ति का दोहरा लाभ है
संसार में चिंता अहंकार सफलता असफलता आदि से मुक्ति रहित कर्म करने की
शक्ति का विकास और अंत में आध्यात्मिक फल के रूप में जन्म मरण से मुक्ति
और परम धाम की प्राप्ति
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