७(२९)सभी शरीर धारिओं के लिए बृद्धावस्था और मरण ये दो अत्यंत दुःख दाई
होते हैं मृत्यु और बृद्धावस्था दोनों ज्ञान प्राप्ति और जन्म मरण से
मुक्ति दिलाने वाले हो सकते हैं इस तथ्य का उद्घाटन करते हुएश्री कृष्ण
कहते हैं जो परमात्मा के शरणागत होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते
हैं बे लोग उस ब्रह्म को संपूर्ण अध्यात्म को तथा संपूर्ण कर्म को जान
जाते हैं लोग जन्म लेने के बाद जैसे जैसे विकसित आयु को प्राप्त होते जाते
है बृद्धावस्था तक अपने निज आत्मा को जानने का प्रयत्न नहीं करते
हैं और न यह समझने की चेस्टा करते हैं की बृद्धावस्था शरीर के विकास क्रम
में एक निश्चित अपरिवर्तनीय अवस्था है इस से कोई कितना भी प्रयत्न करे बच
नहीं सकता है इसी प्रकार शरीर की मृत्यु भी स्वाभाविक है किन्तु शरीर को
धारण करने वाली आत्मा की न मृत्यु है और न उसमे परिवर्तन होता है वह
अविनाशी और सभी प्रकार के परिवर्तनों से मुक्त है संसार समाज को जानने के
लिए कर्मेन्द्रिओं और ज्ञानेन्द्रिओं की आवश्यकता होती है क्योँकि शरीर और
संसार का स्वभाव एक सा है जिसप्रकार शरीर में परिवर्तन होते हैं उसी प्रकार
से संसार में भी निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं आत्मा और परमात्मा एक
स्वभाव के हैं न परमात्मा की मृत्यु होती है और न उनमे परिवर्तन होता है
इसी प्रकार न आत्मा की मृत्यु होती है और न परिवर्तन होता है इसलिए आत्मा
सरीर में रहते हुए भी सरीर से पृथक है इसके लिए उसको परमात्मा का आश्रय
लेना पड़ता है तभी वह ब्रह्म एक निगुण निराकार संपूर्ण ब्रह्माण्ड में
व्याप्त एकशक्ति है इसका अनुभव जन्य ज्ञान प्राप्त करता है और वह इस बोध को
भी प्राप्त हो जाता है की मृत्यु शरीर की होती है आत्मा की नहीं तथा
संपूर्ण कर्मो के रहस्य को समझ लेता है की सभी कर्मों का प्रारम्भ और अंत
होता है और बे शरीर द्वारा किये जाते है आत्मा अकर्ता है इस प्रकार समझ कर
मनुष्य जरा मरण के भय से मुक्त होकर परमात्मा आत्मा अध्यात्म कर्म का
वास्तविक स्वरुप समझ कर जन्म जरा और मरण से मुक्त हो जाता है
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