5(18}एक आरोप वैदिक धर्म विरोधी वैदिक धर्म पर यह लगाते रहते है की वैदिक
धर्म जन्म से वर्ण व्यबस्था को मानता है इसमें शूद्रों के साथ भेद भाव की
नीति मूल रूप से विद्द्यमान है यहां भगवान श्रीकृष्णा गुणों और कर्मो के
आधार पर पंडित की व्याख्या करते हुए कहते है ज्ञानीजन (पंडित)विद्द्या और
विनय युक्त ब्राह्मण में तथा गाय हाथी कुत्ते और चांडाल में में भी सम्भाव
रखते है तो ज्ञानी वह नहीं है जो किसी जाति विशेष में उत्पन्न हुआ है
बल्कि ज्ञानी वह है जो प्राणिमात्र को आत्म दृष्टि से देखता
है चाहे वह विद्द्या विनय से युक्त ब्राह्मण हो फांसी की सजा प्राप्त को
शूली पर चढ़ाने वाला जल्लाद हो गाय हो या कुत्ता या हाथी उपयोगता के हिसाब
से वाह्य ब्वोबहार में तो अंतर होगा किन्तु सभी में परमात्मा का निवास है
और सभी परमात्मा द्वारा रचे गए है इस लिए उनके प्रति उंच नीच का भाव नहीं
होगा जैसे स्वार्थ के कारण आज देश में रिश्वत खोरी दलाली चल रही है किन्तु
यह जायज नहीं है यह बुराई है जिसके कारण भारत की पृथिष्ठा को धक्का पहुंचा
है उसी प्रकार स्वार्थ के कारण लोगों ने छुआ छूत उंच नीच आदि चीजो को
उत्पन्न किया है यह बुराई है और इसकी समाप्ति के लिए महापुरुषों ने प्रयत्न
कर सफलता भी पायी है और इन महापुरुषों के कारण जाति प्रथा लगभग समाप्ति की
और बढ़ रही थी किन्तु राजनीती ने गुणबिहीन जाति प्रथा को फिर जीवित कर दिया
है
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