Wednesday, 2 December 2015

लोभ ----- युधिस्ठर ने भीष्म पितामह से पूंछा ----पाप का अधिष्ठान क्या है ?एक मात्र लोभ ही पाप का अधिष्ठान है  ! लोभ से ही पाप की प्रवृत्ति होती है! लोभ से ही पाप अधर्म शठता तथा छल कपट आदि का जन्म होता है ! और लोभी व्यक्तियों के कारण ही राष्ट्रों को दुःख उठाने पड़ते हैं! लोभ से ही क्रोध प्रगट होता है ! लोभ से ही काम की प्रवृत्ति होती है ! और लोभ से ही माया मोह अभिमान उद्दण्ता तथा पराधीनता आदि दोष प्रगट होते हैं ! इसी से मनुष्य पापाचारी हो जाता है ! असहन शीलता निर्लज्जता  संपत्ति नाश धर्म छय  चिंता और अपयश ये सब लोभ के कारण ही होते हैं ! लोभ से ही कृपणता अत्यंत तृष्णा समाज को अहित पहुंचाने वाले काम करने की प्रवृत्ति पद विषयक अभिमान और पद प्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिए सभी वैधानिक नियमों का उल्लंघन, समस्त प्राणियों से निम्न स्वार्थ आधारित सम्बन्ध अभिमान सद्गुणों का तिरस्कार सद्गुणी लोगों की उपेक्छा तथा कुटिलता पूर्ण व्योहार होते हैं  !जो मनुष्यों के बृद्ध होने पर भी जीर्ण नहीं होता है ! वह लोभ ही है ! लोभी मनुष्य बहुत सा लाभ पाकर भी संतुष्ट नहीं होता है ! भोगों से वह कभी तृप्त नहीं होता ! बहुश्रुत विद्वान बड़े बड़े धर्मग्रंथों को कंठस्थ कर लेते हैं  ! परन्तु लोभ में फँसकर उनकी भी बुद्धि मारी जाती है ! और बे निरंतर क्लेश में रहते हैं ! बेलोभ में फसकर शिष्टाचार का  त्याग कर देते हैं ! और दिखाबे के लिए मीठे वचन बोलते हुए भीतर से अत्यंत लोभी होते हैं  !युक्ति बल का आश्रय लेकरबहुत से असत पाखण्ड युक्त  धर्म खड़े कर देते हैं ! तथा लोभ और अज्ञान में स्थित हो धर्म मर्यादाओं का नाश करने लगते हैं ! जो सदा लोभ में डूबे रहते हैं उन्हें तुम अशिष्ट समझो ! तुम्हें शिष्ट पुरुषों से ही अपनी शंकाएं पूँछना चाहिए जिन्हे शिष्टाचार प्रिय है ! जिनमे इन्द्रिय संयम प्रितिष्ठित है ! जिनके लिए सुख दुःख मान अपमान हानि लाभ समान है ! सत्य ही जिनका परम आश्रय है ! बे देते हैं लेते नहीं ! उन्हें सत्कर्म से विचलित नहीं किया जा सकता !  बे केवल सद्भाव के लिए ही प्रयत्न शील रहते हैं जिनमे लोभ और मोह का अभाव है ! उन धर्म प्रेमी महान भावों का तुम सावधान होकर सेवा सत्कार करो ! ये सब महापुरुष स्वभाव से ही बड़े गुनबान होते है ! और शुभ  अशुभ के विषय में उनकी वाणी यथार्थ होती है ! दूसरे लोग तो केवल बातें बनाने वाले होते हैं !

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