इस युग की अहम मांग सुख प्राप्तिकेसाधनो में केंद्रित हो गयी है !यह मांग इतनी प्रवल है ! कि सुखानुरागी मनुष्य अब सुख प्राप्ति के लिए कर्तव्य पालन और गुण विकास की और ध्यान ना देकर सिर्फ प्राचीन लोकहित कारी श्रेय प्रदान करने वाली परम्पराओं का नाम मात्र का दिखावटी पालन करने लगे हैं !और परम्परा निर्बहन के जो मानदंड हैं !उनका पालन न तो भोगासक्त पैर छूने वाले करते हैं !और ना बिना योग्यता के सम्मान प्राप्ति के आकांछी पैर छुलाने वाले करते हैं !इसीलिए इस अत्यंत उपयोगी कल्याण प्रद परम्परा का कल्याणकारी स्वभाव बिलकुल लुप्त होता दिखाई दे रहा है !सनातन धर्म में बृद्ध पुरुष सिर्फ आयु ब्रध पुरुष को नहीं माना गया है !जो ज्ञान बृद्ध है !तपस्वी है !जिसने साधना संयम और आत्मज्ञान से अपनेसमस्त भोग कामना के दोषों को जला दिया है !और जो आत्मज्ञान और परमात्म से युक्तहै !उसको भी बृद्धपुरुष माना गया है ! ऐसे व्यक्तियों के विधिबत चरण स्पर्श करने से सुख संपत्ति आत्मज्ञान आदि की प्राप्ति होती है ! सनक सनन्दन सनातन सनत्कुमार ,आदि शंकराचार्य अष्टाबक्र, ,सुखदेव , स्वामी राम तीर्थ, ज्ञान देव, स्वामी विवेकानंद आदि ये सभी तपस्या से बृद्ध कोटि मेमाने जाते हैं !और इन्हे स्वभाव सिद्ध आशीर्वाद देने कीशक्ति प्राप्त थी !ऐसे महापुरुषों के समक्छ शाष्टांग प्रणाम करने से आशीर्वाद की प्राप्तिहोतीहै ! साष्टांग प्रणाम करने से मष्तिष्क का स्पेर्श दोनों चरणो पर होता है !और हाथों से स्पर्श पैरों की अँगुलियों और अंगूठों पर होता है !जो महापुरुष आत्मज्ञान से युक्त और भोग कामनाओं से मुक्त होते हैं !उनके चरणो और पेरोंकी अँगुलियों से शक्ति का संचरण होता है ! उनके ह्रदय में लोक कल्याण की भावना होती है !जिसके कारण पैर छूने वाले को सभी प्रकार के धन संपत्ति आयु बृद्धि आदिके लाभ प्राप्त होते हैं !माता पिता ,गुरुजन और आयु बृद्ध पुरुषोंके चरण स्पर्श से भी लाभ होता है !इनके चरण स्पर्श से सुख की प्राप्ति तो होती है !किन्तु आशीर्वाद की प्राप्ति नहीं होती है !क्योँकि ये राग द्वेष से मुक्तनहीं होते हैं ! इसलिए इनके चरण स्पर्श करने से लोकपरम्परा का निर्बाह होता है !और माता पिता तथा गुरुजनो और अपने से अधिक आयु बृद्ध लोगोंके समक्छ नतमस्तक होने से अभिमान का निरसन होता है !आजकल तो चरण छूने की परम्परा पूरी तरह से विकृत हो गयी है !चरण छूने वाले अपने निम्न स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी के भी चरणछूने का नाटक करते हैं !इसीलिए अब चुनाव लड़ने वाले लोग मतदाताओं के समक्छ जैसी मतदाता की ताकत होती है !उसी के अनुसार साष्टांग दण्डवत से लेकर चरणस्पर्श तक करतेहैं !और अब यह चरण स्पर्श करना इतना औपचारिक हो गया हैं !कि लोग सिर्फ घुटनो का ही स्पर्श करते हैं !जब ये नेता चुनाव जीत जाते हैं !तब इनके चरणस्पर्श बो लोगकरनेलगजाते हैं ! जिनके चरण स्पर्श इन्होने किये थे !और जो चुनाव हार जाते हैं !बे चरण छुलाने वालों का अभिनन्दन अभद्र शव्दों से करते हैं !
चरणस्पर्श करने वाली इस कल्याणप्रद परम्परा का विधिवत पालन करने से हीयहपयोगी हो सकती है !
चरणस्पर्श करने वाली इस कल्याणप्रद परम्परा का विधिवत पालन करने से हीयहपयोगी हो सकती है !
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