Saturday, 5 December 2015

5(29)ईश्वर में विश्वास और आस्था रखनेवाले भक्तजन यह मानते है कि समस्त ब्रह्माण्डों का रचैता ईश्वर है तथा जीवात्मा का एक मात्र लक्छ्य परमात्मा की प्राप्ति है परमात्मा की प्राप्ति के लिए कुछ लोग शादी न कर घर नहीं बसाते है जिन्हे हम सन्यासी के नाम से जानते हैं जो गेरुवा वस्त्र आदि धारण करते है कुछ साधु संत भी अविवाहित रह कर सारा जीवन परमात्मा के ध्यान में लगते है किन्तु कुछ साधु संत ऋषि विवाहित भी होते है किन्तु कुछ सन्यासी वेश से सन्यासी संत साधु तो होते है किन्तु कर्मो से भृष्ट होते है तथा उनकी भोगेक्छा सामान्य गृहस्थों से भी बहुत अधिक होती है इसलिए उनकी आस्था परमात्मा से अधिक सांसारिक भोगों में होती है और उनकी प्राप्ति के लिए बे सन्यास के पवित्र कर्म और वेश का नाश करते रहते है यहां भगवान श्री कृष्णा साधु संतों सन्यासिओं की जीवन दृष्टि को बता रहे है जिसके लिए किसी वेश की आवश्यकता नहीं है सिर्फ जीवन जीने की कला की आवश्यकता है जो परमात्मा को सब पारमार्थिक कर्मो का तथा कर्तव्यों के फलों का भोक्ता तथा संपूर्ण लोकों की शृष्टिओं के निर्माता ईश्वरों का भी ईश्वर तथा संपूर्ण भूतों का बिना भेद भाव छोटे बड़े का भेद न मानते हुए निश्वार्थ दयालु प्रेमी जानता है वह परमात्मा की परम शांति को प्राप्त हो जाता है अर्थात ईश्वर भक्तो के जीवन में अपनेलिये कुछ करने का अभाव और समाज देश तथा प्राणिमात्र के प्रिति निश्वार्थ ईश्वरार्पित कर्म करने की प्रवृत्ति होती है इसलिए उन्हें नित्य परमानन्द की प्राप्ति होती है

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