कोई ३०,४० साल से नेताओं ब्लैक मार्केटरों भू माफिआओं दबंगो चापलूसों
दलबदलूँ घूसखोर अधिकारिओं कामचोर कर्मचारिओं ना पढ़ाने वाले अध्यापकों नक़ल
टीप कर पास होने वाले विद्द्यार्थिओं दलाली करने वाले अधिवक्ताओं आदि का
यह स्वर्णिम काल रहा है नेताओं ने दलितों अगड़ों पिछड़ों जातिओं के गठजोड़ से
सम्मान भी पाया अकूत संपत्ति भी पायी तथा परिवार का भी प्रिवेश कराया छात्र
नेताओं ने भी अध्यन करने के बजाय छात्र संघो को अपनी आमदनी का माध्यम
बनाया मुनाफा खोरों ने भी खूब चांदी काटी भू माफिया जमीनो बालू
गिट्टी मिटटी पर अवैधानिक कब्ज़ा करने में सफल रहे नेताओं की चापलूसी करने
वाले लोगों को भी नेताओं के भोग से बचा हुआ प्रसाद प्राप्त हुआ दलबदलू भी
सत्ता प्राप्ति के भूखे नेताओं के द्वारा लाभान्बित हुए अधिकरिओं ने भी
घूस से अकूत संपत्ति एकत्रित की तथा कर्मचारिओं में जो बिलकुल भी काम नहीं
करना चाहते थे बे कर्मचारी नेता बन गए और कर्मचारिओं ने आंदोलन कर
तनख्वाहें तो खूब बढ़वाई किन्तु कर्म संस्कृति इसके बाद भी घूस खोरी से
युक्त रही अध्यापकों ने तो भारी भरकम वेतन प्राप्ति के बाद भी
विद्द्यालयों में न जाने का संकल्प ही कर लिया जिस से प्राइवेट स्कूल
पुष्पित पल्लवित हो रहे हैं विद्द्यार्थिओं ने पड़ने के बजाय नक़ल टीप कर
डिग्री प्राप्त करने का उद्देश्य ही बना डाला अधिवक्ताओं को भी दलाली से
बिना मेह्नत के पैसा कमाने की पद्धति अधिक लाभ दायिक प्रतीति हुई किन्तु इस
स्वर्णिम काल काअब अंत होने वाला है क्योँकि जनता की सहनशक्ति जबाब दे
चुकी है और बर्बादी भी बहुत हो चुकी है तथा इस स्वर्ण काल का समय भी पूरा
हो चूका है और आगे आने वाला समय ईमानदार आदर्श व्यक्तिओं का होगा
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