Wednesday, 9 December 2015

संत चाहे वस्त्र धारी हौं या दिगंबर बे तो सद्भावना के केंद्र होते हैं ! क्योँकि बे विषय भोगों के चिंतन के स्थान पर आत्मचिंतन और परमात्म चिंतन में संलग्न रहते हैं i सारी श्रष्टि को आत्मरूप में देखने के कारण उनमे विषमता का अभाव हो जाता है !  संतो की इस उपलब्धि और आचरण पद्धति को सभी सामान्यजन अपने जीवन में उतारें और सर्वत्र सद्भाव और स्नेह तथा प्रेम का बातावरण  उत्पन्न हो इसके लिए सभी को क्रोध के कारणों और उसके निवारण का उपाय भी  जानना चाहिए ! जब तक किसी भी कार्य के कारण का निवारण नहीं होगा तब तक उस कार्य से मुक्ति नहीं हो सकती है ! भगवान श्री कृष्ण ने गीता में २(६२ ,६३)में क्रोध के कारण बताये हैं और २(६४,६५)में क्रोध मुक्त होने के बाद प्राप्त होने वाली आत्मशांति और आत्मलाभ होने की बात भी बतायी है ! सिकंदर महान की इस घटना को और भी रूपों में बताया गया है !सिकद्दर का गुरु महान दार्शनिक अरस्तू था !जब सिकद्दर विश्व विजय पर निकला तो वह अपने गुरु के पास आशीर्वाद लेने गया था !अरस्तु ने सिकद्दर से कहा कि तुम जब भारत में पहुंचोगे तो तुम्हें वहां ऐसे  आत्मविजयी संतों के दर्शन होंगे !जिन्होंने आत्मविजय की साधना कर प्राणियोँ के सबसे बड़े शत्रु कामशक्ति का नाश कर राग द्वेष कामना आदि से मुक्ति प्राप्त कर विश्व विजव से भी बड़ी विजय अखिल ब्रह्माण्ड के निर्माता परमात्मा से साधर्म्य स्थापित कर ब्रह्माण्ड विजय को प्राप्त कर लिया है !सिकद्दर को पंजाब में यह ज्ञात हुआ कि रावी नदी के तट पर कोई दिगंबर संत निवास करते हैं !सिकद्दर  उन संत के दर्शन के लिए राबी नदी के तट पर गया !सिकद्दर अपने शौर्य और सामराज्य  विजय की सिद्धि से दर्प और अभिमान से ग्रस्त था !उसने आत्माभिमान से युक्त बाणी से कहा में विश्व विजयी सिकद्दर हूँ !और आपको अपने साथ ले जाना चाहता हूँ !संत ने कहा मुझे आप सहित किसी की भी आवश्यकत नहीं है !आप मेरे सामने से हठ जाइए क्योँकि तुम्हारे सामने खड़े होने से सूर्य का प्रकाश जो मेरे शरीर पर पड़  रहा था ! वह वाधित हो रहा है !सिकद्दर ने कहा आप मेरी अवज्ञा कर रहे हैं !मेरे नाम मात्र को सुनकर बड़े बड़े राजे महाराजे राज्य छोड़कर पलायन कर जाते हैं !उनका जीवन मेरी कृपा पर अबलम्बित होता है !संत ने कहा तुम जीवन ले सकते हो !किन्तु जीवन दे नहीं सकते हो !तुम्हारी आयु के अब कुछ दिन ही शेष रह गए हैं !तुम अपने शरीर से जीवित अपने देश वापिस नहीं पहुँच पाओगे !संत के इस कथन ने सिकद्दर के विजय रथ को रोक दिया था !और वह वहीं से अपने देश की ओर प्रस्थान कर गया था !किन्तु संत की वाणी के अनुसार वह अपने देश में पहुंचने के पहले ही रोग ग्रस्त हुआ !तब उसने अपने अंतिम समय में अपने सेनापति और सैनिकों से कहा था !कि मेरी ल्हाश के चारों तरफ मेरे द्वारा संग्रहीत संपूर्ण धन को सजा देना ! और मेरे दोनों हाथ कफ़न से बाहर निकाल देना तथा पास में मेरी तलवार रख देना ताकि लोग यह देखें की अपार संपत्ति धारण करने वाला सिकद्दर भी  अंत में खाली हाथ गया !सिकद्दर और दिगंबर संत के मिलन की यह घटना भोग पर योग की विजय को भी सिद्ध करती है !

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