श्रेष्ठ पुरुषों ने धर्म का अच्छी प्रकार आचरण किया है ! किन्तु धर्म अर्थ और काम इन दो कारणों से संकुचित हो जाता है ! अत्यंत लोभी का लोभ से ग्रस्त होकर संपत्ति अर्जन करने के प्रयत्न और अत्यंत आसक्ति से सभी मर्यादाओं का उल्लंघन कर पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की इक्छा --- ये दोनों ही धर्म को हानि पहुंचते हैं ! जो मनुष्य इक्छाओं के बशीभूत होकर संपत्ति अर्जित करने की चेस्टा नहीं करते हैं ! और पद तथा प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिए मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते हैं ! वे ही धर्म का वास्तविक पालन करते हैं !आधुनिक समय में धर्म की चर्चा बहुत होती है ! किन्तु धर्म का पालन कहीं कहीं ही होता है! !धर्म का पालन सिर्फ शब्दों से नहीं हो सकता है !धर्म आचरण से ही सधता है !इसिलए धर्म पर अनावश्यक बहस करने के स्थान पर उसको आचरण में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए !इस पर बहस करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होगा कि धर्मनिरपेक्छ कहा जाय या पंथ निर्पेक्छ !प्रत्येक व्यक्ति का धर्म उसके कर्तव्य निर्बहन में दर्शित होना चाहिए !धर्म का मूल स्वरुप धर्मनिरपेक्छ या पंथ निर्पेक्छ भारत में व्यक्तिगत जीवन में हिन्दू मुसलिम ,सिख ईसाई जैन बुद्ध आदि के रूप में हो सकता है !किन्तु सामाजिक जीवन में तो उसका पालन उसकी कर्तव्य निष्ठा से ही होगा !और कर्त्तव्य निष्ठा उसके द्वारा अंगीकृत कार्य से होगी !यदि कोई व्यक्ति न्यायाधीश के पद पर आसीन है ! तो वह किसी भी धर्म मजहब या विचार का क्योँ ना हो ! उसे अपने सभी निर्णय विधि ज्ञान के आधार पर ही देने होंगे ! संविधान ही सभी धर्मों का स्वीकृत स्वरुप है इसीलिए संवेधानिक व्यबस्था का पालन करना सभी लोगों के लिए वैधानिक बाध्यता है !भगवान श्री कृष्णा ने गीता में कहा है अपने अपने कर्तव्यकर्मों में लगा हुआ मनुष्य ही धर्म को प्राप्त होता है !जो कर्तव्य कर्मों का निर्बहन नहीं करता है और सिर्फ धर्म की शव्दिक चर्चा ही करता रहता है !वह धार्मिक नहीं है बल्कि अधार्मिक है !भारत के सभी लोगों को धर्मनिरपेक्छ्ता या पंथ निर्पेक्छ्ता को इसी अर्थ में समझकर अपने कर्तव्यों का निष्ठां पूर्वक पालन करना चाहिए !
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