Saturday, 28 November 2015

अरुन्धिति राय ऐसे लोग भारत को भारत के रूप में नहीं स्वीकार करते हैं !भारत की आचरण पद्धति से एक संस्कृति का निर्माण हुआ है !यह संस्कृति समय और परिस्थिति के अनुसार परिवर्तित भी होती रहती है !किन्तु भारतीय धर्म संस्कृति का आधार सत्य अहिंसा करुणा ,प्रेम सर्वधर्म समभाव और सभी पंथों और धर्मों को आदर देने का रहा है !इसी धर्म संस्कृति को सनातन ,आर्य ,या हिन्दू धर्म आदि नामों से सम्बोधित किया जाता है !जब इस संस्कृति के अनुपालन में कोई व्यबधान आता है !तब तब इसमें संशोधन और सुधार के लिए महापुरुष प्रयत्न करते हैं !इसी स्वतंत्र प्रवाह में बौद्ध सिख धर्म आदि का जन्म हुआ और बे यहाँ पल्ल्वित हुए !इसी श्रंखला में देश में बाहर से आये दो धर्म इस्लाम और ईसाई धर्मों का भी प्रवेश हुआ !और एक बहुत बड़ी संख्या देश में ईसाई और मुसलमानो के रूपमे विद्यमान है !धर्म के नाम पर देश का विभाजन भी हो चूका है !ईसाई और मुसलमान सभी हिन्दू धर्म त्यागकर ही ईसाई या मुसलमान हुए हैं !इसी प्रकार बौद्ध और सिख भी हिन्दू ही है !किन्तु हिन्दुओं ने कभी भी किसी धर्म का रूपान्तरकरण नहीं कराया !उनकी संख्या लगातार कम हुई है !किन्तु धर्मांतरण कराने का प्रयत्न कभी नहीं किया !विश्व के अनेक देश जो भूतकाल में सनातन धर्मी थे आज मुसलिम राष्ट्र या बौद्ध धर्म के मान ने वाले हो गए हैं !हिन्दू सिर्फ भारत में ही बचे हैं !किन्तु भारत में भी उनके ग्रन्थ और आचरण पढ़ती को सर्वमान्य स्वीकृति प्रदान नहीं है !अरुंधति के विचार के बहुत से नाममात्र धारी   हिन्दू भी देश में हैं ! ये भी हो सकता है की अरुंधती हिन्दू ही ना हौं !हिन्दुओं को दुहरा हमला झेलना पड़ता है !और धर्मपरिवर्तन तो हिन्दुओं का होता ही रहता है !इस नाम मात्र की हिन्दू अरुंधती ने अगर हिन्दू धर्म के अमूल्य ग्रन्थ गीता का अध्यन किया होता तो इसको इस बात का ज्ञान हो जाता की ब्राह्मणवाद क्या होता है !भगवान श्री कृष्ण ने १८(४२)में ब्राह्मण के लक्छण बताते हुए कहा है ! मन को अवांछनीय भोग कामनाओं से मुक्त करना ,इन्द्रियों को बस में करना ,सभी प्राणियों के जीवन की रक्छा के लिए अपने निजी स्वार्थों के त्याग की तपस्या करना ,और कष्ट सहना ,अंदर बाहर से शुद्ध पवित्र रहना ,दूसरों के अपराधों को छमा करना ,शरीर मन आदि को सरल और सहज बनाना वेद गीता महाभारत आदि का स्वाध्याय करना ,और लोकहित के कर्तव्य निष्ठा पूर्वक करना , ईश्वर है इसमें आस्था रखना ये सब के सब ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म है !यदि इन गुणों का विकास हो तो अरुन्धती राय ऐसे वासना के कीड़ों को तो स्वाभाविक परेशानी होगी ही !

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