Monday, 2 November 2015

नेति युक्त आचरण --------(१) जो उपदेश से या पढ़ने से प्राप्त ज्ञान को आचरण में उतरने का प्रयत्न नहीं करता है ! उसका ज्ञान व्यर्थ हो जाता हैं !वह सिर्फ ज्ञान के भार को ढोने वाला ही होता है !जो व्यक्ति किसी बात को सुनता और समझाता नहीं है ! उस से कही हुई बात भी नष्ट हो जाती है !जिस व्यक्ति की इन्द्रियां विषय भोगों में अत्यंत आसक्त हैं ! उसका शास्त्र ज्ञान भी व्यर्थ हो जाता है !
(२)बुद्धिमान व्यक्ति अपनी बुद्धि से भली प्रकार जाँच कर ! और  अपने स्वयं के अनुभव से  ज्ञान  का उपदेश करने वाले विद्वान की योग्यता का निश्चय करे फिर दूसरों से सुनकर और स्वयं देखकर भलीभांत विचार करके विद्वानो के साथ मित्रता या सम्बन्ध स्थापित करे !
(३)विनय अपयश को दूर करती है ! पराक्रम अनर्थ को दूर करता है ! छमा सदा ही क्रोध का नाश करती है ! और सदाचार कुलक्छण का नाश करता है !
(४)जन्म किसी भी जाति या कुल में हुआ हो ---- जो मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता है ! सत्कर्म करता है ! ,कोमल, करुणा प्रधान अहिंसक स्वाभाव वाला है ! वह व्यक्ति हजारों  तथाकथित कुलीनों से उत्तम और बढ़कर है !
(५)जिन दो मनुष्यों की बुद्धि ,मन चित्त से बुद्धि ,मन और चित्त आपस में मिलजाते हैं  ! और एकदूसरे में सभी प्रकार की गुप्तता समाप्त हो जाती है ! उनकी मित्रता कभी नष्ट नहीं होती है !
(६)मेधावी विद्वान पुरुष को चाहिए कि तृण से ढके हुए कुंए की भांति दुर्बुद्धि और विचार से हीन, कदाचारी व्यक्ति का परित्याग कर दे ! क्योँकि ऐसे लोगों के साथ मित्रता स्थायी नहीं रहती है !
(७)विद्वान पुरुष को उचित है कि वह अभिमानी ,मुर्ख ,क्रोधी और आचरण तथा नीति विहीन पुरुष के साथ मित्रता न करे !मित्र तो ऐसा होना चाहिए ,जो कृतज्ञ ,नैतिक, सदाचारी उदार ,दृढ अनुराग रखने वाला, अपनी इन्द्रियों को बस में रखने वाला, मर्यादा का पालन करने वाला और मित्रता का त्याग ना करने वाला हो !

No comments:

Post a Comment