ओम तत सत इति श्री मद्भगवत गीतासु उपनिषद सु ब्रह्म बिदयायाम् योगशास्त्रे
श्री कृष्णा अर्जुन सम्बादे ज्ञान कर्म सन्यास योगो नाम चतुर्थो अध्याय यह
पुष्पिका महाभारत में नहीं दी गयी है प्रित्येक अध्याय के अंत में इस
पुष्पिका का जोड़ा जाना कब शुरू हुआ इस सम्बन्ध में स्पष्ट जानकारी नहीं है
किन्तु यह पुष्पिका गीता का ध्येय गीता गायकऔर लेखक का उद्देश्य दर्शाती है
ओम परमात्मा का पवित्र नाम है और इसका उच्चारण करने से रचना के दोष नष्ट
हो जाते है इसलिए ओम शब्द से महर्षि व्यास कहते है की भगवान
श्री कृष्णा के द्वारा दिया गया गीता को जो उपदेश कुरुक्छेत्र के मैदान
में अर्जुन को दिया तथा जिसको मेने दिव्य चक्छुओं से देख कर लिपि बद्ध किया
यदि उामे कोई अंग वैगुण्य रह गया हो तो परमात्मा के पवित्र नाम ओम के
उच्चारण से दूर हो जाय यह गीता ज्ञान परमात्मा को अर्पित है इसका फल
अविनाशी है यही इस गीता शास्त्र का उद्देश्य है यह गीता उपनिषद है तथा
इसमें ब्रह्मविद्या की प्राप्ति कर्मयोग के माध्यम से बताई गयी अर्थात
ब्रह्मविद्या के अंतर्गत यह कर्म योग शास्त्र है तथा यह भगवान श्री कृष्णा
और भक्त अर्जुन का पवित्र सम्बाद है तथा इस अध्याय में ज्ञान कर्म सन्यास
योग प्रस्तुत किया गया है अर्थात कर्म का त्याग किये बिना कर्म सन्यास की
प्राप्ति होती है यह ज्ञान बताया गया है
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