प्राचीन
भारत में आश्रम व्यबस्था स्वाश्रित थी ग्रहश्था या सन्यस्त साधु संतो के
आश्रमों में बृह्मचर्य वृत पालन करने वाले साधक विद्यार्थी आदि रहते थे तथा
आश्रमों में फलदार ब्रिक्छों का रोपण किया जाता था जिस से फलों की
प्राप्ति होती थी कृषि के लिए जमीन होती थी जिस से भोजन की उपलब्धि होती थी
गाय पालन से घी दूध की प्राप्ति होती थी आश्रम किसी भी प्रकार से किसी से
दान आदि स्वीकार नहीं करते थे महात्मा गांधी आचार्य विनोबा भावे तथा अन्य
समर्पित गांधीवादिओं के भी आश्रम बने जिनमे संयम सादगी
सेवा सदाचार आदि का शिक्छण व्यबहारिक जीवन में आचरण से दिया जाता था
किन्तु आज बदले समय में कुछ आश्रमों में बिगाड़ आया है किन्तु कुछ आश्रम आज
भी निष्ठां बान है किन्तु जो आश्रम रिश्बत खोरों भृष्ट ठेकेदारों मुनाफाखोर
व्यापारिओं कमीशन खोर नेताओं आदि के दान से संचालित हो रहे हैं वहां
प्राचीन आश्रम पद्धति के दर्शन नहीं होते हैं बल्कि भारी मात्रा में आश्रम
निर्माण के लिए जंगलो का विनाश हो रहा है जिस से जंगली जीव जंतुओं और
पर्यावरण का नाश हो रहा है संयम सदाचार सेवा बृह्मचर्य का अभाव है आश्रम
योग प्रधान न रह कर भोग प्रधान हो गए है तपस्वी साधु संतो को इस मामले
विचार कर कोई उपाय सुझाना चाहिए किन्तु किसी भी स्थिति में सरकारी हस्तछेप
नहीं होना चाहिए क्योकि आश्रम तो सुद्ध पवित्र हो जायेंगे और मिल भी
जायेंगे किन्तु भृष्ट नौकर शाहों में सुधार होना नामुमकिन है धर्म के नाम
पर होने वाला अधर्म रोक जा सकता है किन्तु जो नौकर अपने कर्त्तव्य का पालन
नहीं करते है तथा जो धार्मिक विधिओं से अनभिज्ञ है बे धार्मिक व्यबस्था का
ही लोप कर देंगे
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