Saturday, 28 November 2015

पंचायती राज्य व्यबस्था के द्वारा लोकतंत्र में ग्रामीणो की सहभागिता सुनिश्चित की गयी है किन्तु जिस रोग से संसद से लेकर विधान सभाओं और जिला पंचायते पीड़ित है वह रोग ग्रामसभाओं में भी लगा हुआ है विकास के लिए जितना पैसा आता है वह प्रधान की जेब में चला जाता है इसमें उसके सहकारी सहयोगी सरकारी अधिकारी होते है प्रधान के चुनाओ में लाखों रुपये खर्च किये जाते है और बाद में लाखो कमाए जाते है इसको रोकने का एक उपाय यह है ग्रामसभा के छेत्र में रहने वाले युवा विरोध में खड़े हो तथा चुनाओ में भी ईमानदार परित्याशी चुने यह काम देश के लिए दूसरी आजादी दिलाने का है इसमें लोगों तथा युवाओं को ग्राम के समग्र विकास को ध्यान में रख कर आंदोलन अपने ही लोगो के विरुद्ध करना होगा आज मेने समाचार पत्रो में तीसरी शक्ति शीर्षक से समाचार पढ़ा किन्तु इस मूल समस्या के समाधान का कोई उपाय नहीं बताया गया है हमलोगो के पास भासण देने के लिए बहुत समय है किन्तु भृष्ट आचरण की कैद में बंद लोकहित की विकाश शील योजनाओ को मुक्त कराने की कोई योजना नहीं है

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