४(३९)जितेन्द्रिय
साधन परायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है और ज्ञान को
प्राप्त होकर वह बिना बिलम्ब के परम शांति को प्राप्त हो जाता है किसी भी
कर्म कि सफलता के लिए बाह्य उपकरण और अन्तः उपकरणों अर्थात मन बुद्धि चित्त
अहंकार श्रद्धा कि आवश्यकता होती है ज्ञान प्रति के संपूर्ण साधन आंतरिक
है जो स्वयं दिखाई नहीं देते है किन्तु उनका प्रकाश ज्ञान के आचरण में
दिखयी देता है ज्ञानी के संपूर्ण कर्म आत्म निष्ठां से युक्त होते है पृथक
पृथक सब प्राणियों वह एक ही अविनाशी आत्मभाव को बिभाग रहित सम्भाव से स्थित
देखता है और इस भाव को अपने आप में उत्पन्न करने के लिए इन्द्रियों पर
नियंत्रण करता है तथा इस बात का सतत ध्यान रखता है कि उसकी दृष्टि आत्म
निष्ठां रहे इस विधि से उसको अविनाशी आत्मा परमात्मा की परम शांति निश्चय
ही शीघ्र प्राप्त होगी यह त्रिविधि प्रयत्न शीघ्र ही ज्ञान को प्राप्त करा
कर अक्षय शांति प्रदान कराता है
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