Wednesday, 11 November 2015

भारत अनादि काल से धार्मिक देश रहा है !इसलिए आत्मा परमात्मा का जितना विशद ज्ञान इस भूमि पर व्यक्त हुआ है !विश्व के किसी अन्य देश में नहीं हुआ !ऋषियों ने काल में होने वाले परिवर्तनों और उनमे धर्म के स्वरूपों को भी अध्यात्म से प्राप्त अपनी अंतर दृष्टि से काल को सतयुग ,त्रेता ,द्वापर ,और कलियुग में विभाजित बताया है !और इन काल खंडो में धर्म के स्वरुप स्वभाव और प्रभाव का भी बर्णन किया है !सतयुग धर्म प्रधान युग होता है !और कलियुग जो इस समय चल रहा है !भोग प्रधान होता है !इस युग में धर्म की अवनति होती है !और धर्म को आत्मज्ञान का साधन ना मानकर लोग भोग प्राप्ति का साधन मान लेते हैं !इसीलिए इस युग में धर्म के रूपमे ढोँग पाखंड झूठ और छल कपट आदि प्रभावी हो जाते हैं !धर्म के नाम से अधर्म प्रभावी होजाता है !इसीलिए समय समय पर धर्म को गति और उसका सही मर्म समझाने के लिए ऋषियों सन्यासियों और साधुओं का जन्म होता रहता है !इसी श्रंखला में आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ !और उन्होंने वैदिक धर्म का सही रूप भारत में प्रस्तुत किया !और चारों दिशाओं में चार शंकराचार्यों के पीठ स्थापित किये !जिनका एकमात्र उद्देश्य वैदिक धर्म संस्कृति का शाश्त्रों द्वारा अनुमोदित वैदिक धर्म का ज्ञान लोगों तक पहुंचाना है !शंकराचार्य स्वामी स्वरूपा नन्द यही कार्य कर रहे हैं !यहाँ इस लेख में भी यह बात बतायी गयी है !कि सांई जन्म से मुसलमान थे !और उनके अंतिम संस्कार में विवाद भी उत्पन्न हुआ था !वह एक चमत्कारी फ़क़ीर थे !किन्तु उनको ईश्वर नहीं माना जा सकता है !वैदिक धर्म के अनुसार भगवान उसको कहा गया है !जो सम्पूर्ण विशाल ब्रह्माण्ड और जीव जगत का निर्माता ,पालन करने ,वाला ,और संघार करने वाला है !ये सभी लक्छण किसी भी साधु संत या फ़कीर में नहीं हो सकते हैं !इसीलिए फ़क़ीर आदर और श्रद्धा का पात्र तो हो सकता है !किन्तु वैदिक धर्म के अनुसार वह ईश्वर नहीं हो सकता है !यही बात शंकराचार्य वैदिक धर्म के मान ने वालों से कह रहे हैं !और साईं की ईश्वर रूप में पूजा का निषेध कर रहे हैं !

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