४(४०)अज्ञानी श्रद्धारहित और संशय युक्त पुरुष नष्ट हो जाता है ऐसे पुरुष
के लिए ना यह लोक है ना परलोक नासुख ही है यहां जिन शब्दों का प्रयोग हुआ
है उनका ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में अनुभव में आने वाली बाधाओं के निबारण
के अर्थ में लिया जाना चाहिए जिस प्रकार भौतिक बस्तुओं के निर्माण प्रयोग
अनुभव आधारित होते है उसी प्रकार ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक उपकरण मन
बुद्धि चित्त अहंकार तथा ५ कर्मेन्द्रियन और ५ग्यानेन्द्र्य है इनका प्रयोग
किस प्रकार ज्ञान के अनुभव के लिया किया जाय तथा इस मार्ग
की प्राप्ति के लिए जो शास्त्रीय मार्ग है उसकी सत्यता पर किसी प्रकार का
संशय मन में ना रख जय तथा श्रद्धा का सम्बल पकड़ कर इस मार्ग पर चलाजाय और
चलने की चेस्टा की जाय लक्ष्य की प्राप्ति प्राप्ति की तत्परत तथा उसके लिए
श्रद्धा युक्त समपर्ण यह त्रिविध मार्ग यदि अनुसरण कर आचरण में नहीं
उतरागया तो ऐसे शंकालु व्यक्ति को वर्तमान जीवन में ज्ञान की उपलब्धि नहीं
होगी तथा ज्ञान अप्राप्ति के कारण मोक्ष की प्राप्ति नहीं होगी और
ज्ञानानंद की भी प्राप्ति नहीं होगी
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