Monday, 30 November 2015

५(६)परमपिता परमात्मा ने मनुष्य योनि में किये गए कर्मो का परिणाम कई प्रकार से निर्धारित किया है उसमे मृत्यु के बाद स्वर्ग नरक की प्राप्ति तथा ८४ लाख योनिओं की प्राप्ति है इस प्रकार आत्मा शुद्धा होने के लिए इन प्रिकियों से गुजरता रहता है मनुष्य योनि कर्म योनि है तथा यह संसार कर्म क्षेत्र है इसके अतिरिक्त देओतोन की योनि से लेकर पशु पक्षी ब्रिक्ष सभी योनिया भोग योनिआ है मनुष्य अपने कर्म शिंघ जैसे कर सकता है किन्तु सिंह के समस्त कर्म मनुष्य जैसे नहीं हो सकते है ८४ळख जन्मो की यात्रा में कुछ आत्माएं इतनी परिशुद्ध हो जाती हैं की उन्हें कर्म बंधन से मुक्त होने के लिए निष्काम कर्म नहीं करना पड़ते है बे उनसे स्वाभाविक रूप से होते है और बे जन्म से ही कर्म बंधन से मुक्त होते है बुद्धा महाबीर शंकराचार्य विनोबा भावे आदि ऐसे ही कर्म बंधन मुक्त सन्यासी थे किन्तु जो सन्यास ग्रहण पर्याप्त आत्म ज्ञान के अभाव में करना चाहते है उनको सन्यास की प्राप्ति बिना आत्म निष्ठ कर्मो के बिना होना कठिन है इसलिए उनके लिए यह आवश्यक है की पूर्ण सन्यास की प्राप्ति के लये पहले परमात्मा को अपने कर्मो को अर्पित करने की साधना करें

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