Thursday, 26 November 2015

४(३३)यज्ञ को गीता ने उसका वास्तविक रूप प्रदान किया है यज्ञ कार्य लोक हित के लिए सम्पादित किया जाता था और उसमे धन की प्रधानता नहीं होती थी प्राचीन काल में ब्राह्मण अपनी बुद्धि इन्द्रिय समूह को आहुति के रूप में आत्मरूप अग्नि में सम्पर्पित करते थे और तपस्या के द्वारा लोक कल्याण करते थे तथा स्वयं त्याग युक्त तपस्या मय विरक्त जीवन जीते थे तथा अपनी देह की शक्ति को समाज को अर्पित करते थे राजा और वैश्य धन सामग्री से यज्ञ करते थे चूँकि राजा प्रजा की शक्ति बृद्धि तथा प्रजापालन के लिए युद्ध आदि करते थे इसलिए इस प्रकार से जो हिंसा होती थी उसका परि मार्जिन यज्ञों से होता था कृषि गाय पालन कपडा चर्म शुद्धि भवन निर्माण आदि का उत्पादिक श्रम वैश्य करते थे इसलिए धन के उपार्जन संग्रह संचय का कार्य वैश्य करते थे तथा सभी प्रकार की आर्थिक गतिविधियाँ उन्ही के द्वारा संचालित होती थी इसलिए वह भी दृव्य यज्ञ करते थे किन्तु कालांतर में सभी समृद्धि शक्ति प्राप्त करने के लिए द्रव्य की प्रचुरता वाले यज्ञ करने लगे तथा महाभारत काल में शक्ति समृद्धि की प्राप्ति तथा शत्रुओं के नाश के लिए यज्ञ आदि किये गए तथा यज्ञ का लोक हित करने वाला स्वरुप नष्ट हो गया इसलिए धन की प्राचुता वाले यज्ञों से ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है क्योँकि ज्ञानयज्ञ सिर्फ लोक हित की दृष्टि से अपनी आकांछाओं को बलिदान कर किया जाता है जिस से सभी भोग प्रधान कार्यो की इति सृति हो जाती है और ज्ञान यज्ञ करने वाला कर्म बंधन से मुक्त हो जाता है

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