Wednesday, 25 November 2015

धर्मनिरपेक्छ्ता -------- प्रकृति में बहुत से खाद्द्य पदार्थों का ऊपरी छिलका बहुत कठोर होता है !किन्तु उस कठोर छिलके के अंदर अत्यंत कोमल और मीठा खाने योग्य पदार्थ होता है !जैसे नारियल ,बादाम ,अखरोट आदि ऐसे ही  फल होते हैं ! इनको छिलकों सहित  खाना संभव नहीं होता है !किन्तु जब इनके छिलके को फोड़  दिया जाता है !तो अत्यंत स्वास्थ्य वर्धक आसानी से खाने वाली गारी उपलब्ध होती है !इन फलों के बाहर के आवरण प्रकृति ने इनके अंदर के कोमल खाने योग्य पदार्थों के लिए ही निर्मित किये हैं !इन बाह्य छिलकों से ही इनकी पहचान भी होती है !इन छिलकों का बस इतना ही महत्त्व है !इसी प्रकार संसार के सम्पूर्ण छोटे बड़े धर्म हैं !इन सभी धर्मों के अंदर सर्व समावेशिक सनातन तत्त्व होता है !जिस से श्रृष्टि में जन्मे सभी जीव जंतुओं की रक्छा एवं सुरक्छा होती है !इन सभी  धर्मों की पहचान इन धर्मों के अलग अलग नामो से होती है !इनकी बाह्य आचरण पद्धति भी काल ,परिश्थिति और देश के अनुसार  भिन्न भिन्न होतइ है ! किन्तु इन सभी धर्मों में अंदर सद्भाव ,शांति ,करुणा ,प्रेम ,सहभागिता अहिंसा आदि तत्त्व कम और अधिक मात्रा में मौजूद होते है !और सभी धर्मों में आत्मशुद्धि और काम क्रोध लोभ क्रूरता आदि को नस्ट करने के लिए भिन्न भिन्न प्रकार की पूजा पद्धतियाँ होती है !धर्म निर्पेक्छ्ता के माध्यम से इन विविध धर्मों के बाह्य स्वरुप के घेरे से निकालकर शुद्ध आत्मस्वरूप को स्थापित करने की चेस्टा की जाती है !धर्म निर्पेक्छ्ता का अर्थ धर्महीनता नहीं है !इसका अर्थ सर्व धर्म सम्भाव है !सभी धर्म अपने ऊपरी छिलकों को उतारकर धर्म के आतंरिक स्वरुप सर्वधर्म समभाव .मैत्री ,करुणा ,प्रेम ,दया ,पारस्परिक मेल मिलाप के साथ रहें और राष्ट्र ,समाज और स्वयं की उन्नतिकरें !भारत के संविधान ने इसीलिए इस धर्म निर्पेक्छ्ता को स्वीकार किया है !भारत अनादिकाल से धर्मनिरपेक्छ रहा है !यहाँ सभी धर्म निर्बाध रूप से फले फुले और पुष्पित हुए हुए हैं !धर्मों की इसी श्रंखला में दो प्रमुख धर्म ईसाई और इस्लाम भी जुड़े !इन धर्मों के मानने वाले भारी संख्या में भारत में निवास करते हैं !इधर कुछ समय से देश में भी धार्मिक काटटरता का समावेश होता दिख रहा है !इसको रोका जाना चाहिए !आज संविधान दिवस है !२६ नबम्बर १९४९ के दिन हमने संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आत्मार्पित किया था !इसलिए हम सबको संविधान के इस धर्मनिरपेक्छ तत्त्व को भली प्रकार समझ कर धर्म के बाह्य स्वरुप के अंदर जो आत्त्म तत्त्व विद्यमान है !उसको अंगीकृत और आत्मार्पित करें  !तथा धार्मिक काटटरता का मन वचन कर्म से त्याग करें !!आत्मोद्धार, ईश्वर की उपासना का मूल तत्त्व का दर्शन और उपलब्धि का खुला द्वार धर्मनिरपेक्छ्ता में  ही है !

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