Friday, 27 November 2015

४(३६)सबसे बड़ा पापी भी ज्ञान नौका पर बैठकर संपूर्ण पाप समुद्र से निशन्देह भलीभांति तर जायेगा यह सामाजिक व्यबश्था तथा धर्म मर्यादा को छिन्न भिन्न करने वाले अबांछित अवैधानिक अधार्मिक तरीके से भोग के लिए धन संचय करने वाले या शाब्दिक ज्ञान के माध्यम से ज्ञान के नाम पर भोग भोगने वाले अज्ञानिओं के लिए अनुज्ञा पत्र नहीं है यह ज्ञान उन ज्ञानिओं की जीवन चर्या और आचरण पद्धति को लेकर दिया गया है जिन्होंने शरीर और आत्मा की पृथकता का बोध प्राप्त कर लिया है जिसका वर्णन दूसरे अध्याय से प्रारम्भ कर दिया गया है कर्म ज्ञान युक्त तथा भक्ति प्रधान होगा तो पाप हो ही नहीं सकता है अर्जुन युद्ध छेत्र में स्वजनो पूज्य जनो आदि के बध से मोहग्रस्त होकर धर्मस्थापना के निमित्त से होने वाले अधर्मिओं के संघार से उपराम होकर भीख जैसे निकृष्ट कर्म को अपने स्वभाव और स्वधर्म के विपरीत कर्म करने की बात करने लगता है और जो दिव्या शक्तियां उसे प्रदान करायी गयी है उनका उद्देश्य भी विफल करता प्रतीत होता है इसलिए उसे ज्ञानं युक्त भक्ति प्रधान कर्म करने की विधि बताकर यहां भी और आगे भी १८(१७)में यह कहा जायेगा की इस विधि से कर्म करने पर मोक्ष प्राप्ति बाधित नहीं होगी

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