नीतियुक्त आचरण ------(१)जिस सुख का सेवन करते रहने पर भी मनुष्य सदाचार और नीति से भ्रष्ट नहीं होता है ! उसका वह यथेष्ठ सेवन करे किन्तु निद्रा आलस्य प्रमाद आदि के अधिक सेवन से बचता रहे !
(२)दुष्ट बुद्धि वाले मनुष्य सरलता से जीवन यापन करने वाले लोगों को असक्त और असमर्थ समझ कर उनका अपमान कर देते हैं !
(३)अत्यंत श्रेष्ठ ,अतिशय दानी ,अतीब शूरवीर अधिक ब्रत नियमों का पालन करने वाले और बुद्धि के घमंड में चूर रहने वाले मनुष्यों के पास सिर्फ जीवन निर्बाह के लिए ही संपत्ति होती है !बे ना अधिक धनी होते हैं ! और ना अधिक निर्धन !
(४)लक्छमी के रहने का और ठहरने का कोई निश्चित मान दंड नहीं है !अधिक गुणवान होने से लक्छमी प्राप्त हो जायेगी !या दुराचार के कारण नष्ट हो जायेगी !इसके सम्बन्ध में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है !देखने में आता है ! कि अत्यंत बेईमान और कदाचार तथा दुराचार में आकंठ डूबे व्यक्ति भी धन संपत्ति से युक्त देखे जाते हैं !और ऐसे लोग निर्धन और संकट ग्रस्त देखने में भी आते हैं !इसी प्रक़र गुणवानो और सदाचारियों के पास भी संपत्ति देखी जाती है !किन्तु बहुत से गुणी व्यक्ति निर्धन भी देखे जाते हैं !लक्छमी निरंकुश होती है !और उन्मत्तत की भांति जहां चाहती है !वहां ठहर जाती है !और जब चाहे चली जाती है !इसलिए विद्वान पुरुष को लक्छमी होने के बाद उसका उपयोग लोकहित के कार्यों में करना चाहिए !और ना होने पर संतोष धारण करना चाहिए !किन्तु लक्छमी की प्राप्ति के लिए अपने आचरण को भ्रष्ट नहीं करना चाहिए !ऐसा विद्वानो का कथन है !
(५)जो अधर्म ,अनीति से कमाए हुए धन से पारलौकिक कर्म करके आत्मशांति प्राप्त करने का प्रयत्न करता है!!वह जीवन में कभी आत्मशांति नहीं पाता है और मरने के बाद भी उसे सद्गति की प्राप्ति नहीं होती है ! क्योँकि उसने संपत्ति की प्राप्ति राष्ट्र और समाज के हितों पर कुठारा घात कर प्राप्त की होती है
(२)दुष्ट बुद्धि वाले मनुष्य सरलता से जीवन यापन करने वाले लोगों को असक्त और असमर्थ समझ कर उनका अपमान कर देते हैं !
(३)अत्यंत श्रेष्ठ ,अतिशय दानी ,अतीब शूरवीर अधिक ब्रत नियमों का पालन करने वाले और बुद्धि के घमंड में चूर रहने वाले मनुष्यों के पास सिर्फ जीवन निर्बाह के लिए ही संपत्ति होती है !बे ना अधिक धनी होते हैं ! और ना अधिक निर्धन !
(४)लक्छमी के रहने का और ठहरने का कोई निश्चित मान दंड नहीं है !अधिक गुणवान होने से लक्छमी प्राप्त हो जायेगी !या दुराचार के कारण नष्ट हो जायेगी !इसके सम्बन्ध में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता है !देखने में आता है ! कि अत्यंत बेईमान और कदाचार तथा दुराचार में आकंठ डूबे व्यक्ति भी धन संपत्ति से युक्त देखे जाते हैं !और ऐसे लोग निर्धन और संकट ग्रस्त देखने में भी आते हैं !इसी प्रक़र गुणवानो और सदाचारियों के पास भी संपत्ति देखी जाती है !किन्तु बहुत से गुणी व्यक्ति निर्धन भी देखे जाते हैं !लक्छमी निरंकुश होती है !और उन्मत्तत की भांति जहां चाहती है !वहां ठहर जाती है !और जब चाहे चली जाती है !इसलिए विद्वान पुरुष को लक्छमी होने के बाद उसका उपयोग लोकहित के कार्यों में करना चाहिए !और ना होने पर संतोष धारण करना चाहिए !किन्तु लक्छमी की प्राप्ति के लिए अपने आचरण को भ्रष्ट नहीं करना चाहिए !ऐसा विद्वानो का कथन है !
(५)जो अधर्म ,अनीति से कमाए हुए धन से पारलौकिक कर्म करके आत्मशांति प्राप्त करने का प्रयत्न करता है!!वह जीवन में कभी आत्मशांति नहीं पाता है और मरने के बाद भी उसे सद्गति की प्राप्ति नहीं होती है ! क्योँकि उसने संपत्ति की प्राप्ति राष्ट्र और समाज के हितों पर कुठारा घात कर प्राप्त की होती है
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