नीतियुक्त आचरण ------(१)इन्द्रियोँ को पूरी तरह नियंत्रण में रख पाना तो मृत्यु से भी बढ़कर कठिन है !किन्तु उन्हें बिलकुल अनियंत्रित खुला छोड़ देना देवताओं का भी नाश कर देता है !
(२)संपूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता का भाव ,गुणों में दोष न देखना ,छमा ,धैर्य ,और मित्रों का अपमान ना करना ----ये सब गुण आयु को बढ़ाने वाले हैं --ऐसा विद्वान लोगों का कथन है !
(३)जो नष्ट हुई संपत्ति को स्थिर बुद्धि का आश्रय ले उत्तम नीति से पुनः प्राप्त करने की इक्छा करता है !उसके इस आचरण की प्रसंसा सभी श्रेष्ठ पुरुष करते हैं !जो आनेवाले दुःख के रोकने का उपाय जनता है ! वर्तमान काल के कर्तव्य का पालन दृढ निश्चय से करता है ! और अतीतकाल में जो कर्तव्य शेष रह गया है उसे भी जानता समझता है ! वह मनुष्य कभी अर्थ से हीन नहीं होता है !
(४)मनुष्य मन वाणी से जिस कर्मका निरंतर चिंतन मनन और सेबन करता है ! ,वह कार्य उस पुरुष को अपनी और खींच लेता है !इसीलिए बुद्धिमान विद्वान पुरुष हमेशा कल्याण कारी विचारों का ही मनन ,चिंतन और कर्म करने में संलग्न रहते हैं !
(५)मांगलिक पदार्थों का स्पर्श ,चित्त बृत्तियों का निरोध ,उत्तम ग्रंथों का स्वाध्याय ,उद्द्योग शीलता ,सरलता ,और सत्पुरुषों का बार बार दर्शन और सत्संग ---ये सब कल्याण कारी हैं !
(६)हमेशा उद्द्योग में लगे रहना ,----उस से विरक्त ना होना ,इस से धन और संपत्ति की प्राप्ति होती है !और संपत्ति प्राप्त कर कल्याणकारी ,लोकहित के कार्यों में अनासक्त भावसे से रत रहना ये महान मनुष्यो के आचरण में हमेशा विद्यमान रहते हैं ! और वह प्रगति करता हुआ अनंत सुख का भागी होता है !
(७)समर्थ पुरुष के लिए सब जगह और सब समय में छमा के समान हितकारक और अत्यंत श्री संपन्न बनाने वाला उपाय दूसरा नहीं माना गया है !जो शक्ति हीन है वह तो समय पर छमा करे ही ! जो शक्तिमान है ! वह भी छमा करे ! तथा जिसकी दृष्टि में अर्थ और अनर्थ (नीति ,अनीति )दोनों समान है ! उसके लिए तो छमा सदा ही हितकारिणी होती है !
(२)संपूर्ण प्राणियों के प्रति कोमलता का भाव ,गुणों में दोष न देखना ,छमा ,धैर्य ,और मित्रों का अपमान ना करना ----ये सब गुण आयु को बढ़ाने वाले हैं --ऐसा विद्वान लोगों का कथन है !
(३)जो नष्ट हुई संपत्ति को स्थिर बुद्धि का आश्रय ले उत्तम नीति से पुनः प्राप्त करने की इक्छा करता है !उसके इस आचरण की प्रसंसा सभी श्रेष्ठ पुरुष करते हैं !जो आनेवाले दुःख के रोकने का उपाय जनता है ! वर्तमान काल के कर्तव्य का पालन दृढ निश्चय से करता है ! और अतीतकाल में जो कर्तव्य शेष रह गया है उसे भी जानता समझता है ! वह मनुष्य कभी अर्थ से हीन नहीं होता है !
(४)मनुष्य मन वाणी से जिस कर्मका निरंतर चिंतन मनन और सेबन करता है ! ,वह कार्य उस पुरुष को अपनी और खींच लेता है !इसीलिए बुद्धिमान विद्वान पुरुष हमेशा कल्याण कारी विचारों का ही मनन ,चिंतन और कर्म करने में संलग्न रहते हैं !
(५)मांगलिक पदार्थों का स्पर्श ,चित्त बृत्तियों का निरोध ,उत्तम ग्रंथों का स्वाध्याय ,उद्द्योग शीलता ,सरलता ,और सत्पुरुषों का बार बार दर्शन और सत्संग ---ये सब कल्याण कारी हैं !
(६)हमेशा उद्द्योग में लगे रहना ,----उस से विरक्त ना होना ,इस से धन और संपत्ति की प्राप्ति होती है !और संपत्ति प्राप्त कर कल्याणकारी ,लोकहित के कार्यों में अनासक्त भावसे से रत रहना ये महान मनुष्यो के आचरण में हमेशा विद्यमान रहते हैं ! और वह प्रगति करता हुआ अनंत सुख का भागी होता है !
(७)समर्थ पुरुष के लिए सब जगह और सब समय में छमा के समान हितकारक और अत्यंत श्री संपन्न बनाने वाला उपाय दूसरा नहीं माना गया है !जो शक्ति हीन है वह तो समय पर छमा करे ही ! जो शक्तिमान है ! वह भी छमा करे ! तथा जिसकी दृष्टि में अर्थ और अनर्थ (नीति ,अनीति )दोनों समान है ! उसके लिए तो छमा सदा ही हितकारिणी होती है !
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