Friday, 8 January 2016

१(१२ ,13) तस्य सञ्जनयन हर्षं कुरूब्रद्धाः  पितामह -------- कौरवों में बृद्ध भीष्म पितामह ने दुर्योधन का उत्साह बढ़ाने के लिए शंख बजाया ! यद्द्पि भीष्म पितामह से भी अधिक आयु मे बड़े शांतुन के भाई बान्हीक भी युद्ध में मौजूद थे ! किन्तु बल में और ज्ञान में श्रेष्ठ होने के कारण यहाँ भीष्म को बृद्ध कहा गया है महाभारत काल में जो ब्राह्मण ज्ञान सदाचार और स्वधर्म के पालन में श्रेष्ठ होते थे बे भले ही आयु में छोटे हों उन्हें ज्येष्ठ  कहा जाता था ! छत्रिय बल की दृष्टि से और वैश्य धन की दृष्टि से ज्येष्ठ और शूद्र आयु की दृष्टि से सम्मानीय माने जाते थे  !युद्ध में तथा सभी मांगलिक कार्यों में शंख बजाये जाते थे ! इसीलिए भीष्म पितामह ने बहुत जोर से शंख बजाया जिस से दुर्योधन के ह्रदय में हर्ष उत्पन्न होगया है ! यह शंख ध्वनि सेना में विजय के लिए संकल्प के भाव को दर्शित करती थी ! भीष्म पितामह के शंख बजाने के साथ ही सभी सेनापतियों और प्रमुख सैनिकों ने शंख भेरी (नगाड़े )ढोल मृदंग और नरसिंघे एक साथ बजाये !इस से बड़ा भयंकर कोलाहल पैदा हो गया !दुर्योधन की सेना में शंख और दुंदभियों की ध्वनि सैनिकों के सिंघनाद, घोड़ों की हिनहिनाहट ,रथ के पहियों की घरघराहट, हाथियों की गर्जना तथा गरजते हुए योद्धाओं के सिंघनाद करते हुए ताल ठोँकने और जोर जोर से बोलने की तुमुल ध्वनि सब ओर व्याप्त हो गयी शंख और भेरी आदि वाददयों का सम्मिलित भयंकर शब्द जब एक दूसरे पर गर्जन तर्जन करने वाले रणवीर शूरों के सिंघनाद से मिला तब दोनों सेनाओं में महान कोलाहल एवं संघर्श की तैयारी होने लगी !

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